खूटियों पर ख़ामुशी लटकाई है

सरवत ज़ेहरासरवत ज़ेहरा5 May 1972

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खूटियों पर ख़ामुशी लटकाई है

अलगनी पर सूखती तन्हाई है

चाँद की उजली डली बरगद तले

हिज्र की सत आसमाँ ले आई है

दर्द की इक चिपचिपाती गोंद में

डेवढ़ियों तक चुप की छुट्टी आई है

ऊँचे लम्बे इन सुतूनों के तले

डोलती ठंडी हवा सौदाई है

नींद के ख़्वाबी पपोटों के तले

फाँस सी चुभती हुई पुर्वाई है

बिस्तरों की चादरें हैं बे-शिकन

हाँ सिरहाने पर खड़ी ज़ेबाई है

सरवत ज़ेहरा
About the poet

सरवत ज़ेहरा

मूल नाम : सरवत ज़ेहरा जन्म : 05 May 1972 | कराची, सिंध

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