तराना-ए-बिस्मिल

Ram Prasad BismilRam Prasad Bismil11 Jun 1897 – 19 Dec 1927

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बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से,
लटकते आए अक्सर पैकरे-ईसार फांसी से।

लबे-दम भी न खोली ज़ालिमों ने हथकड़ी मेरी,
तमन्ना थी कि करता मैं लिपटकर प्यार फांसी से।

खुली है मुझको लेने के लिए आग़ोशे आज़ादी,
ख़ुशी है, हो गया महबूब का दीदार फांसी से।

कभी ओ बेख़बर तहरीके़-आज़ादी भी रुकती है?
बढ़ा करती है उसकी तेज़ी-ए-रफ़्तार फांसी से।

यहां तक सरफ़रोशाने-वतन बढ़ जाएंगे क़ातिल,
कि लटकाने पड़ेंगे नित मुझे दो-चार फांसी से।

Ram Prasad Bismil
About the poet

Ram Prasad Bismil

DescriptionRam Prasad Bismil was an Indian revolutionary who participated in Mainpuri conspiracy of 1918, and the Kakori conspiracy of 1925, and struggled against British imperialism. Bismil was hanged on 19 December 1927 by the British for his revolutionary…

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