दूर से आये थे साक़ी - नज़ीर अकबराबादी

नज़ीर अकबराबादीनज़ीर अकबराबादी

11 min read · 12.3K reads

है आबिदों[1] को त‘अत-ओ-तजरीद[2] की ख़ुशी
और ज़ाहिदों[3] को जुहाद[4] की तमहीद[5] की ख़ुशी
रिन्द आशिकों को है कई उम्मीद की ख़ुशी
कुछ दिलबरों के वल की कुछ दीद की ख़ुशी

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

पिछले पहर से उठ के नहाने की धूम है
शीर-ओ-शकर सिवईयाँ पकाने की धूम है
पीर[6]-ओ-जवान को नेम‘तें[7] खाने की धूम है
लड़कों को ईद-गाह के जाने की धूम है
 
ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

कोई तो मस्त फिरता है जाम-ए-शराब से
कोई पुकारता है कि छूटे अज़ाब[8] से
कल्ला[9] किसी का फूला है लड्डू की चाब से
चटकारें जी में भरते हैं नान-ओ-कबाब से

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

क्या है मुआन्क़े[10] की मची है उलट पलट
मिलते हैं दौड़ दौड़ के बाहम झपट झपट
फिरते हैं दिल-बरों के भी गलियों में गट के गट[11]
आशिक मज़े उड़ाते हैं हर दम लिपट लिपट

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

काजल हिना ग़ज़ब मसी-ओ-पान की धड़ी
पिशवाज़ें[12] सुर्ख़ सौसनी लाही की फुलझड़ी
कुर्ती कभी दिखा कभी अंगिया कसी कड़ी
कह “ईद ईद” लूटें हैं दिल को घड़ी घड़ी

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

रोज़े की ख़ुश्कियों से जो हैं ज़र्द ज़र्द गाल
ख़ुश हो गये वो देखते ही ईद का हिलाल[13]
पोशाकें तन में ज़र्द, सुनहरी सफेद लाल
दिल क्या कि हँस रहा है पड़ा तन का बाल बाल

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

जो जो कि उन के हुस्न की रखते हैं दिल से चाह
जाते हैं उन के साथ ता बा-ईद-गाह
तोपों के शोर और दोगानों की रस्म-ओ-राह
मयाने, खिलोने, सैर, मज़े, ऐश, वाह-वाह

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

रोज़ों की सख़्तियों में न होते अगर अमीर
तो ऐसी ईद की न ख़ुशी होती दिल-पज़ीर
सब शाद हैं गदा से लगा शाह ता वज़ीर
देखा जो हम ने ख़ूब तो सच है मियां ‘नज़ीर‘

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी
नज़ीर अकबराबादी
About the poet

नज़ीर अकबराबादी

View profile & all 96 Poems / Stories

More from नज़ीर अकबराबादी

  1. नज़ीर ग्रन्थावली - नज़ीर अकबराबादी

    सिवादे-शामे-ग़म[1] से रूह थर्राती है क़ालिब[2] में।नहीं मालूम क्या होगा, जो इस शब की सहर होगी॥

    12.4K reads
  2. नज़ीर ग्रन्थावली-2 - नज़ीर अकबराबादी

    सिवादे-शामे-ग़म[1] से रूह थर्राती है क़ालिब[2] में।नहीं मालूम क्या होगा, जो इस शब की सहर होगी॥

    12.4K reads
  3. शहरे आशोब - भाग १ - नज़ीर अकबराबादी

    है अब तो कुछ सुख़न२ का मेरे कारोबार बंद ।रहती है तबअ३ सोच में लैलो निहार४ बंद ।

    12.4K reads
  4. शहरे आशोब - भाग २ - नज़ीर अकबराबादी

    कोई पुकारता है पड़ा ‘भेज’ या ‘ख़ुदा’ ।अब तो हमारा काम थका भेज या ख़ुदा ।

    12.4K reads
  5. समधिन - नज़ीर अकबराबादी

    सराप[1] हुस्ने-समधिन गोया गुलशन की क्यारी हैपरी भी अब तो बाज़ी हुस्न में समधिन से हारी है

    12.4K reads

More Poetry & Stories You May Like