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नज़ीर ग्रन्थावली - नज़ीर अकबराबादी
सिवादे-शामे-ग़म[1] से रूह थर्राती है क़ालिब[2] में।नहीं मालूम क्या होगा, जो इस शब की सहर होगी॥
नज़ीर ग्रन्थावली-2 - नज़ीर अकबराबादी
सिवादे-शामे-ग़म[1] से रूह थर्राती है क़ालिब[2] में।नहीं मालूम क्या होगा, जो इस शब की सहर होगी॥
शहरे आशोब - भाग १ - नज़ीर अकबराबादी
है अब तो कुछ सुख़न२ का मेरे कारोबार बंद ।रहती है तबअ३ सोच में लैलो निहार४ बंद ।
शहरे आशोब - भाग २ - नज़ीर अकबराबादी
कोई पुकारता है पड़ा ‘भेज’ या ‘ख़ुदा’ ।अब तो हमारा काम थका भेज या ख़ुदा ।
समधिन - नज़ीर अकबराबादी
सराप[1] हुस्ने-समधिन गोया गुलशन की क्यारी हैपरी भी अब तो बाज़ी हुस्न में समधिन से हारी है
नज़ीर अकबराबादी: Quick Answers
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Poems & Stories by नज़ीर अकबराबादी
नज़ीर ग्रन्थावली - नज़ीर अकबराबादी
सिवादे-शामे-ग़म[1] से रूह थर्राती है क़ालिब[2] में।नहीं मालूम क्या होगा, जो इस शब की सहर होगी॥
नज़ीर ग्रन्थावली-2 - नज़ीर अकबराबादी
सिवादे-शामे-ग़म[1] से रूह थर्राती है क़ालिब[2] में।नहीं मालूम क्या होगा, जो इस शब की सहर होगी॥
शहरे आशोब - भाग १ - नज़ीर अकबराबादी
है अब तो कुछ सुख़न२ का मेरे कारोबार बंद ।रहती है तबअ३ सोच में लैलो निहार४ बंद ।
शहरे आशोब - भाग २ - नज़ीर अकबराबादी
कोई पुकारता है पड़ा ‘भेज’ या ‘ख़ुदा’ ।अब तो हमारा काम थका भेज या ख़ुदा ।
समधिन - नज़ीर अकबराबादी
सराप[1] हुस्ने-समधिन गोया गुलशन की क्यारी हैपरी भी अब तो बाज़ी हुस्न में समधिन से हारी है
ऊमस - नज़ीर अकबराबादी
नज़ीर ने इसमें ऊमस (उमस), ईधर (इधर), ऊधर (उधर) या ज़ह्र (ज़हर), नह्र (नहर) आदि का ही प्रयोग किया है। फ़िराक़ गोरखपुरी का कहना है -- जब यह कविता पढ़ना शुरू करें तो उसके छन्द के ताल-सम और झंकार और छन्द की लय को पकड़िए।क्या अब्र की गर्मी में घड़ी पह्र है ऊमस
दिवाली - नज़ीर अकबराबादी
हमें अदाएँ दिवाली की ज़ोर भाती हैं ।कि लाखों झमकें हरएक घर में जगमगाती हैं ।।
ईद उल फ़ितर - नज़ीर अकबराबादी
है आबिदों[1] को त‘अत-ओ-तजरीद[2] की ख़ुशीऔर ज़ाहिदों[3] को जुहाद[4] की तमहीद[5] की ख़ुशी
दूर से आये थे साक़ी - नज़ीर अकबराबादी
है आबिदों[1] को त‘अत-ओ-तजरीद[2] की ख़ुशीऔर ज़ाहिदों[3] को जुहाद[4] की तमहीद[5] की ख़ुशी
रीछ का बच्चा - नज़ीर अकबराबादी
कल राह में जाते जो मिला रीछ का बच्चा।ले आए वही हम भी उठा रीछ का बच्चा ।
बचपन - नज़ीर अकबराबादी
क्या दिन थे यारो वह भी थे जबकि भोले भाले।निकले थी दाई लेकर फिरते कभी ददा ले॥
बालपन-बाँसुरी बजैया का - नज़ीर अकबराबादी
यारो सुनो! यह दधि के लुटैया का बालपन।और मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन॥
Selected Quotes by नज़ीर अकबराबादी (चुनिंदा उद्धरण)
जुदा किसी से किसी का ग़रज़ हबीब न हो ये दाग़ वो है कि दुश्मन को भी नसीब न होथा इरादा तिरी फ़रियाद करें हाकिम से वो भी एे शोख़ तिरा चाहने वाला निकलामय पी के जो गिरता है तो लेते हैं उसे थाम नज़रों से गिरा जो उसे फिर किस ने सँभालाथे हम तो ख़ुद-पसंद बहुत लेकिन इश्क़ में अब है वही पसंद जो हो यार को पसंददिल की बेताबी नहीं ठहरने देती है मुझे दिन कहीं रात कहीं सुब्ह कहीं शाम कहींक्यूँ नहीं लेता हमारी तू ख़बर ऐ बे-ख़बर क्या तिरे आशिक़ हुए थे दर्द-ओ-ग़म खाने को हमCouplets (Sher) by नज़ीर अकबराबादी
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