नज़ीर ग्रन्थावली-2 - नज़ीर अकबराबादी

नज़ीर अकबराबादीनज़ीर अकबराबादी

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सिवादे-शामे-ग़म[1] से रूह थर्राती है क़ालिब[2] में।
नहीं मालूम क्या होगा, जो इस शब की सहर होगी॥

क़फ़स से छूटकर पहुँचे न हम, दीवारे-गुलशन तक।
रसाई आशियाँ तक किस तरह बेबालो-पर होगी॥

फ़क़त इक साँस बाक़ी है, मरीज़े-हिज्र के तन में।
ये काँटा भी निकल जाये तो राहत से बसर होगी॥
नज़ीर अकबराबादी
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नज़ीर अकबराबादी

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