निराला

NagarjunNagarjun30 Jun 1911 – 5 Nov 1998

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बाल झबरे, दृष्टि पैनी, फटी लुंगी नग्न तन
किन्तु अन्तर्दीप्‍त था आकाश-सा उन्मुक्त मन
उसे मरने दिया हमने, रह गया घुटकर पवन
अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन ।

क्षीणबल गजराज अवहेलि‍त रहा जग-भार बन
छाँह तक से सहमते थे शृंगालों के प्राण-मन
नहीं अंगीकार था तप-तेज को नकली नमन
कर दिया है रोग ने क्या खूब भव-बाधा शमन !

राख को दूषित करेंगे ढोंगियों के अश्रुकण
अस्थि-शेष-जुलूस का होगा उधर फिल्मीकरण
शादा के वक्ष पर खुर-से पड़े लक्ष्मी-चरण
शंखध्वनि में स्मारकों के द्रव्य का है अपहरण !

रहे तन्द्रा में निमीलित इन्द्र के सौ-सौ नयन
करें शासन के महाप्रभु क्षीरसागर में शयन
राजनीतिक अकड़ में जड़ ही रहा संसद-भवन
नेहरू को क्या हुआ, मुख से न फूटा वचन ?

क्षेपकों की बाढ़ आई, रो रहे हैं रत्न कण
देह बाकी नहीं है तो प्राण में होंगे न व्रण ?
तिमिर में रवि खो गया, दिन लुप्त है, बेसुध गगन
भारती सिर पीटती है, लुट गया है प्राणधन !

Nagarjun
About the poet

Nagarjun

Vaidyanath Mishra (30 June 1911 - 5 November 1998), better known by his pen name Nagarjun, was a Hindi and Maithili poet who has also penned a number of novels, short stories, literary biographies and travelogues, and was known as Janakavi- the People's Poet.…

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