वह देश

लीलाधर मंडलोईलीलाधर मंडलोई

1 min read · 12.4K reads

जब मिट्टी, सीमेंट, गारे से भरे तसले

फूल की तरह एक से दूसरे हाथ में पहुँचते हैं

गाते हुए श्रमगीत

चूड़ियों से झरता है अनोखा संगीत

और खड़ी हो जाती है गगनचुंबी इमारतें

बन जाते हैं घर याकि स्कूल

इन श्रमशील हाथों में जादू है

कोई सरकार जब इन हाथों में थमा देती हथियार

उजड़ जाते हैं घर, स्कूल और

इमारतें ढहने लगती हैं धूल की मानिंद

वह सरकार, तब सरकार नहीं

बन जाती है हत्यारी।

लीलाधर मंडलोई
About the poet

लीलाधर मंडलोई

View profile & all 31 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like