वे लौट नहीं रहे

लीलाधर मंडलोईलीलाधर मंडलोई

1 min read · 12.4K reads

वे लौट नहीं रहे

हाँ वे लौटते थे

अपने तीज-त्यौहार पर

वे कमा कर लौटते थे

वे ख़ुश-ख़ुश लौटते थे

उनके बच्चे के हाथों में खिलौने होते थे

सस्ते लेकिन उनके दमकते चेहरों के सामने

दुनिया कंगाल दिखा करती थी

और फूलों में उनके लौटने पर

रंग खिल उठते थे और ख़ुशबू

चौगुनी हो जाती थी

और घर का माहौल

ईद और दीवाली-सा हो उठता था

तब उनके लौटने पर लोक

अपने गीतों के साथ मदमस्त हो उठता था

अभी वे लाखों-लाख मजबूर और भयाक्रांत

अपनी बची-खुची गृहस्थी को सिरों पर उठाए

और बच्चों की ज़िंदगी को बचाने का ख़्वाब लिए

बिना गाड़ी-घोड़ा के भाग रहे हैं

वे भाग रहे हैं गिड़गिड़ाते हुए कि उन पर रहम हो

भूखे-प्यासे और बिन पैसों के

डंडे खाते, मुर्ग़ा बनते और उकड़ूँ मुद्रा में

वे बमुश्किल सही भाग रहे हैं

वे जान बचाने की ग़रज़ से भाग रहे हैं

और इस तरह घरों की ओर बेतहाशा भागना

दोस्तों घर लौटना नहीं है।

लीलाधर मंडलोई
About the poet

लीलाधर मंडलोई

View profile & all 31 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like

मुनव्वर राना के शेरअब जुदाई के सफ़र को मिरे आसान करोतुम मुझे ख़्वाब में आ कर न परेशान करो— मुनव्वर रानाहाँ इजाज़त है अगर कोई कहानी और हैहाँ इजाज़त है अगर कोई कहानी और हैइन कटोरों में अभी थोड़ा सा पानी और है— मुनव्वर रानाजबकि भारत उन्हीं का हैकहाँ है उनका ठिकाना? त्रिपुरा, असम, बंगाल,संताल परगना, दक्षिण भारत, मेघालय में— बीरेंद्र चट्टोपाध्यायभूमिहीनभूख के शिकार पर निकले ये शिकारीएकदम मुकम्मल आदमी हैं— हुकुम ठाकुरतालीएक ताली हमारी नाकामी के लिए।माफ़ कीजिए, एक ताली हमारी नाकामी को ढँकने के लिए।— फ़रीद ख़ाँहम भारत के लोगमैं चूँकि नागरिक हूँ अपने देश का।मैं देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन हूँ।— फ़रीद ख़ाँ