दो साबुत आँखें

लीलाधर मंडलोईलीलाधर मंडलोई

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मेरे जीवन के तजुर्बों में कोई दाग़ नहीं है

यह और बात है कि वतन से भागते हुए

बेशुमार लाठियों के नीले दाग़ हैं पीठ पर

घुटनों पर चोटों के अदृश्य निशान हैं

हमले में जाती रही मेरी एक आँख

तलुओं में छालों से बहता रहता है पानी

कमर के पास एक फोड़े में भरा है मवाद

मैं नहीं कोसता अपने भाग्य को

आतंकवादी क़रार कर दिए जाने के बावजूद, मैं हारा नहीं

इसी शरीर के साथ मैं नापता हूँ रेगिस्तान

मेरे तजुर्बे में अब भी दो साबुत आँखें हैं

मैं अब भी देखता हूँ सपने में आज़ादी के लिए उठे हाथ।

लीलाधर मंडलोई
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लीलाधर मंडलोई

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