बहाती हुई। आज और कल
हमारे खेतों के पास से नदी
नया-नया जल बजता है
सुबह तक की रात। शाम तक का दिन
दूर के हाथों पर रख देना कैसा लगता है
कैसा लगता है जब अपनी ख़ाली पीठ लेकर
घोड़े
केवल अपने लिए दौड़ रहे हों
अस्तबल से दूर हरे घास के मैदानों की ओर।
बहाती हुई। आज और कल
हमारे खेतों के पास से नदी
नया-नया जल बजता है
सुबह तक की रात। शाम तक का दिन
दूर के हाथों पर रख देना कैसा लगता है
कैसा लगता है जब अपनी ख़ाली पीठ लेकर
घोड़े
केवल अपने लिए दौड़ रहे हों
अस्तबल से दूर हरे घास के मैदानों की ओर।

लखनऊ में राजेश की आत्महत्या से पहलेहम बहुत सारे कवि-लेखक
जिसने भी लिया हो मुझसे बदलावह उसे दे जाए
फलो!ग़रीब और कमज़ोर बच्चों के लिए
पिछले पतझर में हम कितने रोशन थे जैसे उजाले के दो पेड़घास बड़ी होती है तो आपस में दोस्त हो जाती है
नए अनाज की ख़ुशबू का पुल पार करकेमैं तुम्हारे पास आऊँगा