दूर

लीलाधर जगूड़ीलीलाधर जगूड़ी1 Sept 1940

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बहाती हुई। आज और कल

हमारे खेतों के पास से नदी

नया-नया जल बजता है

सुबह तक की रात। शाम तक का दिन

दूर के हाथों पर रख देना कैसा लगता है

कैसा लगता है जब अपनी ख़ाली पीठ लेकर

घोड़े

केवल अपने लिए दौड़ रहे हों

अस्तबल से दूर हरे घास के मैदानों की ओर।

लीलाधर जगूड़ी
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लीलाधर जगूड़ी

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