वसंत

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआलक्ष्मीनाथ बेजबरुआ

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एक

मालती खिली, सेउती खिलती

केतकी ने ली अँगड़ाई

सुरमयी कोयल छेड़ तान

संदेशा वन को लाई

दो

कण-कण से तारे बिखरेती बकुल

मंदार खेलता होली,

जूही भरती साँस

कमल ने आँखें खोलीं।

तीन

करवीर-कोष में मधु संचय

करती फैलाती चंपा

मधु मतवाली पीली चिड़िया

फिर लौटी कर अनुकंपा।

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ
About the poet

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ

‘साहित्यर्थी’ और ‘रसराज’ के रूप में सुप्रसिद्ध असमिया कवि-लेखक-व्यंग्यकार।

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