बड़ा और छोटा

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआलक्ष्मीनाथ बेजबरुआ

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एक

दूब-पत्ती की नोकों पर

मोती पिरोती ओस चली

मलय हवा उदार स्नेह-करों से

बुहारती आँगन की धूल फैली।

दो

चमकती पंक पर के पंकज की पंखुड़ी

पास आसमान का हास नवल

उड़ रहे पराग कण ओह

पा प्यार का चुंबन निर्मल।

तीन

पर्वत शिखर की नन्ही निर्झरणी

उतर चली धरा की छाती पर

स्नेह-सने करों से करती धरती आलिंगन

रंगों में रही—वह वंदिनी बनकर।

दूर्वा दल से भी लघुतम तू लक्ष्मीनाथ

धूल-कण से भी लघुतम धूल-कण

नहीं भूलेगा तुझे भी तेरा प्रियतम

लेगा आदर से पुकार कर जीवन-पावन।

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ
About the poet

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ

‘साहित्यर्थी’ और ‘रसराज’ के रूप में सुप्रसिद्ध असमिया कवि-लेखक-व्यंग्यकार।

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