भ्रम

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआलक्ष्मीनाथ बेजबरुआ

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कौन कहता, वह बजे बाँसुरी?

वह वनदेवी है गाती गीत।

हरसिंगार की माला नहीं यह

है तारों की गुँथी हार

नहीं फुलवारी यह, हैं कुँवरियाँ सारी

सच कहता बार-बार

गुलाब नहीं ये, प्रिया नयन ये

देख स्तब्ध हो जाता तार

कौन कहता, वह है हिरण-शावक?

कहाँ उसमें इतनी चेतना?

वन की शोभा साकार बन

चरती दूब छलाँग भर-भर कर।

नहीं वह सरोवर, है प्रेमिका-हृदय

पानी नहीं वह, है प्रेम रस

नदी नहीं, सच है प्रेम-प्रवाह

प्रेम खोजता बना विवश

वीणा की आत्मा उड़-उड़ गाती 'गुण-गुण'

कौन कहता, है वह भौंरा?

प्रिया के जूड़े का फूल ही उड़कर

'तितली' का नाम धराया

कहते हैं कि कृष्ण-पक्षी कोई

'कृष्ण-कृष्ण' पुकारे निकुंज वन में?

पक्षी नहीं वह, जानो वह है ब्रज का क्रंदन

प्रतिध्वनि बना घूमता मन में, वन में।

मलय नहीं यह विरही जना की

जमी हुई लंबी साँसें

गाल प्रियतमा के फूले-फूले

वही शाम है, भासे।

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ
About the poet

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ

‘साहित्यर्थी’ और ‘रसराज’ के रूप में सुप्रसिद्ध असमिया कवि-लेखक-व्यंग्यकार।

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