माँ ख़ुश नहीं होती
यदि होती ज़िंदा—
देखती अपने पति को वृद्धाश्रम ले जाते हुए
दोनों बेटों-बहुओं के बेटे-बेटियाँ भी
इतने बड़े नहीं हुए थे कि ख़ुश हो सके
या
ख़ुशी से पीट सके तालियाँ—
जब बिठाया जा रहा था दादा जी को कार में
घर-मकान, दीवारों के कान ज़रूर थे
लेकिन मुँह नहीं
इसलिए बोल नहीं सके वे भी कुछ भी
कहते हैं बेटे—इधर हम ख़ुश हैं
उधर वृद्धाश्रम में पिताजी
पिताजी बहुत हँसते रहते हैं
मिलते हैं हम सब जब,
जब भी
लाखों कमाने वाले,
पढ़े-लिखे चूतिया बेटे
कभी समझ न सके कि—
हँसने का मतलब हमेशा
हँसना नहीं होता।








