कभी ज़रूर मिलेंगे ओ मेरे दोस्त

खेमकरण ‘सोमन’खेमकरण ‘सोमन’2 Jun 1984

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देश की राजधानी में भूख

कर देती मेरी हत्या

और मेरी लाश!

फेंक देती इधर-उधर कहीं गंदगी में

मैं सड़ता रहता परंतु हत्यारी भूख

निराश हो गई !

बात है कुछ समय पहले की है

जब कहीं जाने के लिए मज़बूर था मैं

घर से बहुत दूर था मैं

चुराने वाले चुरा चुके थे मेरे बैग मेरे पैसे

पहली बार घर से निकला था मैं—

मैं रोने लगा

मुझे घर की याद आई

क्षण-क्षण बाद आई

भीड़ से निकलकर तभी एक सज्जन आए

आपबीती सुनी मेरी बीच राह

दिया नव उत्साह

खाना खिलाया भरपेट

बिठाकर बस में दिए कुछ पैसे भी

और कहा—हम कभी ज़रूर मिलेंगे ओ मेरे दोस्त!

फिर कभी नहीं मिले वे

लेकिन मिल गई मुझे एक कहानी

कोई परेशान है तो भीड़ से निकलकर

ध्यान रखना है कैसे

भूखे व्यक्ति का सम्मान रखना है कैसे

खाना खिलाना है कैसे? देने भी हैं कुछ पैसे

कैसे भेजना है उसको अपने घर

ठीक से बस में बिठाकर

हाँ! ये कहते हुए—

हम कभी ज़रूर मिलेंगे ओ मेरे दोस्त!

खेमकरण ‘सोमन’
About the poet

खेमकरण ‘सोमन’

नई पीढ़ी के कवि-लेखक। 'नई दिल्ली दो सौ बत्तीस किलोमीटर' चर्चित कविता-संग्रह। मूल नाम : खेमकरण ‘सोमन’ जन्म : 02/06/1984 | नैनीताल, उत्तराखंड

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