एक
देश के नाम पर आदेश नहीं चाहिए
मेरे लथपथ ख़ून में दौड़ते हैं
हज़ारों-हज़ार बाँकुरे घोड़े!
दो
मेरे शब्दों की शोभायात्रा हो, मेरे शब्द क्रूर-कुटिल रात के प्रहरी हों
कौंधती रहने दो विद्रोह की पैनी तलवारें
बेचैन शब्दों के उल्लसित रक्त-प्रवाह में।
तीन
मेरी क़मीज़ में झलक उठती है कातरता
मंद पड़ गई हैं मेरी गहरी साँसें
भीतर बहुत बेचैनी, बहुत अस्थिरता
सतर्क प्रहरी हवा जैसे उत्सुक होकर पानी में नाचती हैं मछलियाँ
मेरे चारों तरफ़ उद्यत मृत्यु; मृत्यु के दक्ष हाथ या फिर
मृत्युंजय प्रतिभा का आच्छादित आभास।








