मुझे भी अपना प्रेमी बना लो
कातर देह में खेले वसंत-हवा
'प्रिय' शब्द आकर टकराने दो हृदय से
मुक्त हों वर्णबोध के बंदी अक्षर
उनके शरीर में
झिलमिलाए उत्सव की पोशाक
आओ, तुम्हारा गान सुनें, प्रेम का निर्जन गान।
मुझे भी अपना प्रेमी बना लो
कातर देह में खेले वसंत-हवा
'प्रिय' शब्द आकर टकराने दो हृदय से
मुक्त हों वर्णबोध के बंदी अक्षर
उनके शरीर में
झिलमिलाए उत्सव की पोशाक
आओ, तुम्हारा गान सुनें, प्रेम का निर्जन गान।

जोत-कोड़ डालो इस परती आदमी-ज़मीन कोलोहे के तेज़ फाल से तोड़-तोड़ डालो
कहीं भी गद्य का उजाला नहीं हैबहुत फ़ीकी पड़ गई मेरी कविता
मेरे सीने में था गुलाब-बाग़ीचाएक दिन ख़ून से लथपथ एक गुलाब ने
कठोरता से ठोकर खाकर लौट आती है कवि की आवाज़,प्रतिद्वंद्वीविहीन
मेरी क़लम लोहार के हाथ का हथौड़ा, ठोंक-पीट कर बनाता हूँ शब्दकिसान के फाल जैसा पैना; हलरेखा में सोने की सीता,