बोध का अक्षर

हीरेन भट्टाचार्यहीरेन भट्टाचार्य

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मुझे भी अपना प्रेमी बना लो

कातर देह में खेले वसंत-हवा

'प्रिय' शब्द आकर टकराने दो हृदय से

मुक्त हों वर्णबोध के बंदी अक्षर

उनके शरीर में

झिलमिलाए उत्सव की पोशाक

आओ, तुम्हारा गान सुनें, प्रेम का निर्जन गान।

हीरेन भट्टाचार्य
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हीरेन भट्टाचार्य

हीरेन भट्टाचार्य

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