चाँद पर नाव

हेमंत कुकरेतीहेमंत कुकरेती13 Mar 1965

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आओ! चाँद पर नाव चलाते हैं

उसने गंभीर होकर कहा

आस-पास हत्यारे थे उनके हत्या करने के विचार

इन दिनों छुट्टियाँ मनाने परिवार सहित गाँव गए थे

जुलूस में गए हुए पड़ोसी गला बैठ जाने से

गरारे कर रहे थे

परिवार में दूर के संबंधी के मरने की

चार दिन पुरानी ख़बर

रोटी के साथ परोसी गई

स्कूल से भागे हुए बच्चे ज़्यादा खाने से परेशान थे

हँस-हँसकर पेट दुख रहे थे औरतों के

जो सर्दियों को बुन रही थीं

अपने पतियों के मज़ाक़ के साथ

सूरज वक़्त पर उगता था रात समय पर होती थी

राजधानी में सूखे का डर नहीं था

सरकारी घोषणाएँ डरी हुई थीं मित्र देश के गृहयुद्ध से

बच्चे जन्म ले रहे थे बूढ़ों की उम्र बढ़ रही थी

उसने मज़ाक़ में नहीं कहा था कि

चाँद पर नाव चलाते हैं

यह बात उससे गंभीरता से कहलवाने में

किसकी भूमिका थी?

समाज में जो जहाँ था उसे वहाँ नहीं होना चाहिए था

आस-पास रेत थी नाव नहीं थी कहीं

चाँद इमारतों के पीछे छटपटा रहा था

हेमंत कुकरेती
About the poet

हेमंत कुकरेती

सुपरिचित कवि। भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित। मूल नाम : हेमंत कुकरेती जन्म : 13/03/1965 | गढ़वाल, उत्तराखंड

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