रविवार के दिन ढूँढ़ रहा मैं रविवार

हरि मृदुलहरि मृदुल

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कोरोना काल के रविवार का हाल

सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और
शनिवार तो नियमित आ रहे
लेकिन रविवार पता नहीं कहाँ ग़ायब हो जा रहा

दो महीने पहले तक तो बड़े धूम के साथ आता था
सोमवार से ही शुरू हो जाता था इंतिज़ार
और शनिवार आते ही इस क़दर मुदित हो जाता मन कि
लगने लगता बस अगले ही क़दम पर तो है
यह अपना अति प्रिय वार

उफ़, इस लॉकडाउन में 
कई कूढ़मगजों ने कई-कई बार कहा है मुझसे
‘वर्क फ़्रॉम होम’ के इन दिनों
क्या रवि, क्या सोम
अब तो सातों दिन ही सुकून!
लेकिन सच्चाई तो है एकदम ही उलट कि
आलू-प्याज़ और अनाज के बीच
कहीं दुबक गए रविवार को मैं
आज फिर ढूँढ़ रहा हूँ
पसीने से तरबतर

हरि मृदुल
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हरि मृदुल

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