रोना

हरि मृदुलहरि मृदुल

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आख़िर ऐसी बात कौन-सी

भर आए आँखों में डब-डब आँसू

पोंछते ही इनके फिर भर आने में है संदेह

इसलिए पोंछने की होती नहीं इच्छा

सूख रहे आँखों में ही अब

बस कोरों पर ही थोड़े बचे हुए हैं

शीशे के सम्मुख खड़े हो लिए

ऐसे दृश्य देखने के भी हम उत्सुक

हरि मृदुल
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हरि मृदुल

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