दोस्त चार हज़ार नौ सौ सतासी थे
पर अकेलापन भी कम न था
वहीं खड़ा था साथ में
दोस्त दूर थे
शायद बहुत दूर थे
ऐसा कि रोने-हँसने पर
अकेलापन ही पूछता था क्या हुआ
दोस्त दूर से हलो, हाय करते थे
बस स्माइली भेजते थे...
दोस्त चार हज़ार नौ सौ सतासी थे
पर अकेलापन भी कम न था
वहीं खड़ा था साथ में
दोस्त दूर थे
शायद बहुत दूर थे
ऐसा कि रोने-हँसने पर
अकेलापन ही पूछता था क्या हुआ
दोस्त दूर से हलो, हाय करते थे
बस स्माइली भेजते थे...

जब सारे जाने हुए रास्ते बंद हो जाते हैंतो आदमी एक नए रास्ते के बारे में सोचता है
आज कुछ मित्रों को अमित्र बनायायह काम पूरी मेहनत व समझदारी से किया
खिलाड़ी दोस्तों के बारे मेंबताने से पहले ही सावधान कर दूँ कि
कब तक मौन रहोगेविवादी समय में यह पूछना बहुत ज़रूरी है
अब अपनी डायरी मेंजब भी लिखना चाहता हूँ कविताएँ