एक दिन वापस पाऊँगा सब—
निष्काम सागर से यश
निर्लोभ तारों के गर्भ से शृंगार
जीभ के अशुद्ध आस्वाद से ओंकार तक
उस दिन होगा आरंभ
उपहास समय का
देह को हिस्सों में बाँट
सहलाते हाथों का
या तुम्हें चीरफाड़ कर
खाट के नीचे फेंकने
के अधिकार का
जीत नहीं है किसी की—
उस दिन जीत केवल
अंग-विहीन विग्रह की
जीत निष्काम,
आलिंगन से बँधी आशाओं की।








