पानी की चमड़ी तले
कुईं की उँगलियों में
देखता नाख़ूनों का बढ़ना
सफ़ेद हो चुके मांस को देखता
भयंकर अविश्वास की ज्योत्स्ना में
बहुत ही ज़रूरतों से गढ़े
अपने अमानुषपन को
देखता लगभग रोज़ ही
एक दिन अचानक बदल जाता हूँ मैं
देखते-देखते
नहीं रहता मैं मनुष्य
पृथ्वी पर
मुझे ढूँढ़ रहे हो कौन तुम—
छत से ढलकी पसरी धूप की
धार में
अस्थिर धूल कणों के नृत्य में?
मैं अब इन चीज़ों में नहीं
नहीं, नहीं मैं
ग्लानि से भरी कल्पना के रेशे में
नहीं
नाख़ून बढ़ाते माँस की
महानता में
ढूँढ़ो मुझे
चित्रार्पिता को खाते वक़्त दीमक
अँधेरी कोठरी में,
मैं रहता वहीं
निश्चल-सा
छोटे-बड़े अनेक आलिंगनों में।








