सोचने का वक़्त है कहाँ
कुछ कहना ही होगा
इसी पल, वरना
पत्थर हो जाएगी समूची सुबह
अगले दृश्य में
व्याधि को रखो बीज में
अभिमान को आदर्श में
क्षोभ को क्षमा में
और हिंस्रता को हँसी में
फिर बदल जाना ऐसे
कुछ न हुआ हो जैसे—
रोज़ के चौपड़ में
मत्त हैं नवदंपति
सूर्य को साक्षी मान कहो :
कुछ भी तो नहीं हुआ कल रात
बस थोड़ा-सा ग्रहण
लग गया था चाँद को।








