खेल जारी है

हरप्रसाद दासहरप्रसाद दास

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नटी की ज़ुबान पर बस वही बात

बीती ताहि बिसार दे

सो मानना पड़ता है कि

खेल जारी है (जारी न है)

बस इतना मान लेना है बड़ी बात

अतीत के द्वापर से

अब तक जैसे-तैसे

लीला के लिए

बचे हैं

दो एक गोपाल

बड़ी बात है यह

बढ़ते जा रहे हैं दिन

दिन को लील रहे हैं दिन

बातों का सिरा पकड़

शायद कोई गोपाल लौट जाए

कभी वापस न आने वाले यौवन तक

एक और गोपाल फिर

हो जाए बूढ़ा

बिसरी बातों की वापसी के पूर्व

विस्तृत यौवन की अगली सुबह तक

भला क्या किया जाए

भविष्य के लिए

ऐसे में?

खेल जारी है

मानने के बाद

कुछ भी न हो शायद

फिर भी समग्र पृथ्वी को

है प्रतीक्षा

कहीं कुछ हो जाए शायद।

हरप्रसाद दास
About the poet

हरप्रसाद दास

ओड़िया भाषा के सुपरिचित कवि-निबंधकार-स्तंभकार। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

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