“नहीं चाहिए कवित्त,
कविता का नहीं अब भविष्य
कवियों को हम आगे
अजायबघरों में रखेंगे”
विमर्शकों की जिह्वाएँ
बोलती हैं अँधेर यह
सुनते नहीं हो, ओ
निद्राधीन कविवरो!
व्यास वाल्मीकि होमर
शेक्सपियर की परंपरा
बढ़ाए जाने वाले
वीरो सुनते हो तुम
सर्व लोकों के नायक
भगवान ने तुम्हें
दे दिया है वैभव
स्वर्ग रचने का महा
मानव संस्कृति की सुंदर
मन्दार डालियों पर
खिला कुसुम जो डोलता
मनोज्ञ काव्य-सून है
कविता है नित्य तरुण
स्वतः प्रोज्वल सुंदर।








