धर्मयुग पत्रिका

धर्मवीर भारतीधर्मवीर भारती25 Sept 1926 – 4 Sept 1997

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है कोई संत राम अनुरागी, जाकी सुरति साहब से लागी।
अरस परस पिवके संग राती, होय रही पतिबरता।
दुनिया भाव कछु नहिं समझै, ज्यों समुंद समानी सरिता।
मीन जायकर समुंद समानी, जहँ देखै जहँ पानी
काल कीर का जाल न पहुंचै, निर्भय दौर लुभानी।
बावन चंदन भौंरा पहुंचा जहँ बैठ तहँ गंधा।
उड़ना छोड़ के थिर हो बैठा निसदिन करत अनंदा।
जन दरिया इक राम भजन कर, भरम बासना खोई।
पारस परस भया लोह कंचन बहुर न लोहा होई।
धर्मवीर भारती
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