Selected Quotes
Poetry & Stories
सुबह भीगी रेत पर - देवेन्द्र आर्य
जल्दी आकर नाम लिखाओ,पहले हँस कर जरा दिखाओ।
कवि नहीं कविता बड़ी हो - देवेन्द्र आर्य
इस तरह तू लिखकि लिख के कवि नहीं कविता बड़ी हो
दो रुपये का आज - देवेन्द्र आर्य
बाप न मारी मेंढकी बेटा तीरंदाज़सुनो सन्नाटे की आवाज़
गर्भवती का गीत - देवेन्द्र आर्य
इधर कई दिन से वसंत मुझसे बतियाता हैसिरहाने मंजरियों के गुच्छे रख जाता है
शून्य हूँ मैं - देवेन्द्र आर्य
शून्य हूँ मैंमुझसे मिल कर आपकी औक़ात
देवेन्द्र आर्य: Quick Answers
When was देवेन्द्र आर्य born?
देवेन्द्र आर्य was born on 18 September 1957. Associated place: गोरखपुर, उत्तरप्रदेश, भारत.
Where can I read देवेन्द्र आर्य's poetry?
Kavishala has 37 poems and stories by देवेन्द्र आर्य, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by देवेन्द्र आर्य
सुबह भीगी रेत पर - देवेन्द्र आर्य
जल्दी आकर नाम लिखाओ,पहले हँस कर जरा दिखाओ।
कवि नहीं कविता बड़ी हो - देवेन्द्र आर्य
इस तरह तू लिखकि लिख के कवि नहीं कविता बड़ी हो
दो रुपये का आज - देवेन्द्र आर्य
बाप न मारी मेंढकी बेटा तीरंदाज़सुनो सन्नाटे की आवाज़
गर्भवती का गीत - देवेन्द्र आर्य
इधर कई दिन से वसंत मुझसे बतियाता हैसिरहाने मंजरियों के गुच्छे रख जाता है
शून्य हूँ मैं - देवेन्द्र आर्य
शून्य हूँ मैंमुझसे मिल कर आपकी औक़ात
नदिया का पेट काट के - देवेन्द्र आर्य
नदिया का पेट काट केऊँचे हो गए घरौन्दे ।
सच की तरह - देवेन्द्र आर्य
तोड़ती हैएक चुप्पी
रोटी का संविधान - देवेन्द्र आर्य
दिल्ली झण्डा और देशगानसाधू जंगल गइया महान ।
सोना और प्लास्टिक - देवेन्द्र आर्य
अगर कभी पैदा किए जा सके सोने मेंप्लास्टिक के गुण तो दाम इसके चढ़ेंगे?
यह भी हो सकता है - देवेन्द्र आर्य
यह भी हो सकता है अच्छा हो, मगर धोखा होक्या पता गर्भ में पलता हुआ कल कैसा हो
मन सूखे पौधे लगते हैं - देवेन्द्र आर्य
मन सूखे पौधे लगते हैंरातों के बातूनी खंडहर दिन कितने बौने लगते हैं।
मेरी भी आँख में गड़ता है भाई - देवेन्द्र आर्य
मेरी भी आँख में गड़ता है भाईमगर रिश्तों में वो पड़ता है भाई
Selected Quotes by देवेन्द्र आर्य (चुनिंदा उद्धरण)
जल्दी आकर नाम लिखाओ,पहले हँस कर जरा दिखाओ।इस तरह तू लिखकि लिख के कवि नहीं कविता बड़ी होबाप न मारी मेंढकी बेटा तीरंदाज़सुनो सन्नाटे की आवाज़इधर कई दिन से वसंत मुझसे बतियाता हैसिरहाने मंजरियों के गुच्छे रख जाता हैशून्य हूँ मैंमुझसे मिल कर आपकी औक़ातनदिया का पेट काट केऊँचे हो गए घरौन्दे ।Videos on देवेन्द्र आर्य
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