चार जने बैठे थे जीमने रात का भोजन
सब बच-बच कर खा रहे
तीनों बच्चे तक समझदार
पीते बीच-बीच में पानी
पिता लेते नक़ली डकार
पर कम ख़ुदा न थी परोसने वाली
बहुत है अभी इसमें
मैंने तो देर से खाया
कहते परोसती जाती
माँ थी
सबके बाद खाने वाली
जिसके लिए दाल नहीं
देवकी में बची थी हलचल
चुल्लू भर पानी की
और कटोरदान में भाप के चंद्रमा जैसी
रोटी की छाया थी।








