प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता

चंद्रकांत देवतालेचंद्रकांत देवताले7 Nov 1936 – 14 Aug 2017

1 min read · 12.4K reads

तुम्हारी निश्चल आँखें

तारों-सी चमकती हैं मेरे अकेलेपन की रात के आकाश में

प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता

ईथर की तरह होता है

ज़रूर दिखाई देती होंगी नसीहतें

नुकीले पत्थरों-सी

दुनिया भर के पिताओं की लंबी क़तार में

पता नहीं कौन-सा कितना करोड़वाँ नंबर है मेरा

पर बच्चों के फूलों वाले बग़ीचे की दुनिया में

तुम अव्वल हो पहली क़तार में मेरे लिए

मुझे माफ़ करना मैं अपनी मूर्खता और प्रेम में समझता था

मेरी छाया के तले ही सुरक्षित रंग-बिरंगी दुनिया होगी तुम्हारी

अब जब तुम सचमुच की दुनिया में निकल गई हो

मैं ख़ुश हूँ सोचकर

कि मेरी भाषा के अहाते से परे है तुम्हारी परछाईं।

चंद्रकांत देवताले
About the poet

चंद्रकांत देवताले

सातवें दशक के समादृत कवि। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित। मूल नाम : चंद्रकांत देवताले जन्म : 07/11/1936 | बैतूल, मध्य प्रदेश निधन : 14/08/2017 | इंदौर, मध्य प्रदेश समकालीन हिंदी कविता के प्रमुख कवि चंद्रकांत देवताले का जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवार में 7 न…

View profile & all 50 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like