औरतों को कैसे याद रह सकता है
कब-कब और कितनी बार
आते-आते आँसुओं को आँखों में आने से रोका
और उसी क्षण होंठों पर हँसी पैदा करने में वे कामयाब हुईं
इस कोशिश और करिश्मे के पीछे
कितनी गलाज़त है, कितनी हिंसा, मज़बूरी कितनी
ताक़त और आत्मसम्मान कितना
न तो वे जान सकते हैं जो उन्हें कोंच रहे थे
जानवर या फ़रिश्तों की तरह भीतर
और न वे जो बाहर उनके हँसते हुए चेहरों से मुख़ातिब हुए
दुख भरे दालानों से गुज़रते आती है औरत
और झाँकती है वसंत की खिड़की से
बेहद क़रीने से वह ढाँप लेती है भरपूर अँधेरा आसानी से
और कई बार चमकते अकेले तारे की तरह प्रसन्न
और सुंदर लगती है
जीवन और मज़बूरी का पाठ पढ़ें इसमें
या इसे ख़ूबसूरत फ़नकारी समझें ज़ुल्मों से जूझते रहने की
कुछ लोगों को त्रिया चरित्तर की प्रचलित उक्ति से
मदद मिलेगी और वे इसे ख़ारिज कर देंगे
जैसे न्यायालयों में कई दुखड़ों को
इस लायक ही नहीं समझा जाता
कि उन्हें मेज़ पर रक्खा जा सके
सचमुच औरतों का हँसना
कई बार पर्दे की तरह होता है
अमूमन प्रारंभ और अंत के बीच
मध्यांतर में गिरे पर्दे की तरह।








