देर तक बैठकर पढूँगा तुम्हें
नर-नारी के प्रेम के बीच
रात के स्टेशन या दीप्र मैदान में,
मछलियों की तैराकी से लेकर पंछियों की उड़ान तक—
अब तक नहीं जान सका जो
आज जान लूँगा उन सबके माने।
देर तक बैठकर पढूँगा तुम्हें
नर-नारी के प्रेम के बीच
रात के स्टेशन या दीप्र मैदान में,
मछलियों की तैराकी से लेकर पंछियों की उड़ान तक—
अब तक नहीं जान सका जो
आज जान लूँगा उन सबके माने।

यह छाया, सुनिविड़ संतान है तुम्हारीऔर फल—तुम्हारा पतन;
ज़िंदा हूँज़िंदा रहूँगा
सिरहाने मृत्यु की छाप नहीं आती है जब तकउससे पहले जानता हूँ तुम नहीं रुकोगी स्मृति।
लगता है पृथ्वी में समस्त दृश्य ही है पुनरावृत्तियों कामनुष्य रहेगा बैठा, घास पर उसका प्रेम
आगामी वसंत में हो सकता हूँ मैं और भी अधिक नष्ट—रहस्यमय प्रकाश, प्रीतिमय पाप की प्रतीक्षा से