भविष्य के गर्भ में

Bhuvaneshvar Prasad Shrivastavaभुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव

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सन्ध्या का समय था। भास्कर की ज्योति दिन-भर चमक लेने पर धूमिल हो गयी थी। वे प्रस्थान की तैयारी कर रहे थे। विहग-वृन्द इस विदाई के अवसर पर मंगल गान गा रहे थे। वायु फिर भी गंभीरता से चल रही थी। ऐसे अवसर पर सुखी आदमियों का सुख और दुखियों का दुख और भी बढ़ जाता है। एक उद्यान में लुइजा अपने पिता की समाधि के सामने एक शिलाखण्ड पर बैठी ध्यानावस्थित थी। एक के बाद दूसरे भाव उसके हृदय में सागर की तरंगों की भाँति हिलोर ले रहे थे। सहसा किसी ने पुकारा 'लुइजा'। लुइजा की विचारधारा टूट गई। आगन्तुक की ओर डबडबाए नेत्रों से देखा और एक क्षण बाद अपना सिर घुटनों के बीच छिपा लिया।

चार्ल्स अब लुइजा के समीप आ चुका था। लुइजा के कन्धे पर हाथ रखकर बोला - 'लुइजा, तुम्हारे पिता की मृत्यु को पन्द्रह दिन व्यतीत हो गए। फिर भी एक नादान बच्ची के समान रो रही हो। ईश्वर का धन्यवाद दो जिसने तुम्हारे पिता को अन्त तक विजयी बनाया। आजीवन मातृभूमि (स्पेन) की सेवा की। अन्त समय में भी जब भीषण क्रान्ति मची हुई थी, नीति-अनीति, फ़ासिज्म और प्रजातंत्रवाद में तुमुल संघर्ष चल रहा था, तुम्हें आपत्तिजनक स्थान से निरापद स्थान को पहुँचा दिया। अब तुम्हीं बताओ कि उनका कौन-सा अरमान रह गया था जो पूरा न हो सका। ऐसे वीर पिता की वीर मृत्यु पर तुमको गर्व होना चाहिए। तुम्हें याद होगा, उनकी मृत्यु के समय उनके मुख पर कितने सन्तोष और कितनी शान्ति की आभा थिरक रही थी। उठो, लुइजा उठो, हाथ-मुँह धोवो, देखो विहगों के कल-कूजन में प्रकृति का मूक आह्वान भी मुखरित हो उठा है।'

सिर झुकाए लुइजा न जाने यह सुन रही थी या कुछ और ही सोच रही थी। चार्ल्स के चुप होने पर उसने अपना सिर उठाया और छलछलाई आँखों से चार्ल्स की ओर निहारकर दीनता से कहा - 'चार्ल्स।' उसकी वाणी में कम्पन था, स्वर में वेदना थी और उसके मुँह पर थी एक अस्पष्ट आकांक्षा की धूमिल छाप।

चार्ल्स सिहर उठा। ओह! रमणी के आँसू में न जाने कितने तुंग-शिखरों के ध्वंस के कीटाणु, कितनी प्रलयंकर उल्कापातों की ताली तथा कितनी भीषण अग्नि-उत्पातों की एक चिनगारी निहित होती है। बेचारा चार्ल्स ही सिहर उठा तो कौन-सी बड़ी बात थी।

चार्ल्स को अब मालूम हो गया कि लुइजा को अपने पिता के मरने के अतिरिक्त भी कोई दुख है जिसको कि वह खुल के बता नहीं रही है। वाणी की अस्पष्टता उसके हृदय को और भी दुखित कर रही है। वह लुइजा से प्रेम करता था। वह उसको किसी भी दुख में नहीं देख सकता था। यदि लुइजा को भी वह सुखी नहीं कर सका, तो उसका जीवन ही व्यर्थ है। आवेश में परन्तु दृढ़तापूर्वक उसने कहा -'लुइजा, मुझे बताओ, तुम्हें अन्य कौन-सी बात खटकती है? मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि प्राण रहते मैं तुम्हारे कष्ट के निवारण की चेष्टा करूँगा।' चार्ल्स की आँखें चमकने लगीं। ऐसी भीष्म-प्रतिज्ञा जीवन में एक ही बार की जाती है। सारा जीवन तो उसके निभाने ही में लग जाता है।

लुइजा ने चार्ल्स की प्रतिज्ञा सुनी। आशा और सुख, विस्मय और शान्ति, भय और विषाद की एक अद्भुत मिश्रित रेखा उसके मुखमंडल पर नाच गई। परन्तु जिस बात को वह एक सप्ताह से बराबर कहने की सोच रही हो और न कह सकती हो, उसको एकदम कैसे कह दे। चार्ल्स उसको प्यार करता था। परन्तु लुइजा चार्ल्स को नहीं चाहती थी। उसका हृदय फ़िलिप्स के लिए, जिसे स्पेन में ही राष्ट्रवादी सेना के साथ बलवाइयों के विरुद्ध लड़ने के लिए रोक लिया गया था, व्याकुल रहता। वह चार्ल्स से उसी का पता लगाना चाहती थी।

लुइजा को अब भी चुप देखकर चार्ल्स अधीर हो उठा। ज़ोरदार शब्दों में उसने फिर कहा, 'बोलो लुइजा, वह कौन-सी वस्तु है जिसकी कमी तुम्हें खटकती है, वह कौन-सा दुख है जो तुम्हें इतने दिनों से सता रहा है। उसका नाम तो ले लो, देखो चार्ल्स क्या करता है।'

लुइजा अब अपने को रोक नहीं सकी। शरीर के तमाम बिखरे साहस को बटोरकर उसने कहा - 'चार्ल्स, मेरा स्पेन का साथी फ़िलिप्स मैड्रिड जिसे स्पेन में ही रोक लिया गया है, बलवाइयों के विरुद्ध युद्ध करने के लिए। तब से उसका कोई पता नहीं मिला। ईश्वर न करे उसको कुछ...' वह अधिक नहीं बोल सकी और दोनों हाथों से सिर ढाँपकर सिसक-सिसककर रोने लगी।

चार्ल्स को अब लुइजा की स्थिति का पता चला। वह सन्न रह गया। हृदय के आवेश में वह सोच रहा था यदि लुइजा आकाश के तारे माँगेगी तो वह आसमान में छेद कर उसको लाने की चेष्टा करेगा; यदि वह अपने पिता की समाधि पर बड़ी इमारत बनाना चाहेगी तो मैं बात की बात में गगनचुम्बी अट्टालिका बनवा दूँगा। और यदि उसे किसी उच्च पदाधिकारी से शिकायत होगी तो क्षण भर में उसका शिरच्छेद कर दूँगा। परन्तु सर्प ने अपनी ही मणि की भिक्षा की कल्पना भी नहीं की थी। जीव ने कभी सोचा भी नहीं था कि कोई उसी से उसके प्राणों की भीख चाहेगा। उसका चेहरा मलिन हो गया, और माथा लटक गया। फिर भी उसने धीरे से कहा, 'अच्छा लुइजा, मैं तुम्हारे फ़िलिप्स का पता शीघ्र लगा लूँगा।' व्याकुलता भरी निगाहों से लुइजा अब भी उसकी ओर देख रही थी।

फ्रांस के करकेसोन (Carcassonne) नगर में प्रभात हो गया था। दिनकर की क्रूर किरणें तारक दल का संहार कर अवनि तल पर फट पड़ी थीं। अम्बर का मुख क्रोध से तमतमा गया था। परन्तु समस्त वायुमण्डल पर उसका अरोक आधिपत्य जमता देख वह शान्त हो चुका था किसे ज्ञात था कि प्रतिशोध अग्नि जो उसके अभ्यन्तर में सुलग रही थी कब धू-धू कर जल उठेगी।

चार्ल्‍स यात्रा की तैयारी कर रहा था। वस्त्र से सुसज्जित हो उसने अस्त्र सम्हाले और घर से बाहर हो गया। घोड़ा तैयार था एक छलाँग में वह बैठने ही वाला था कि लुइजा ने जल्दी से बाहर निकलकर कहा - 'कुछ क्षण और ठहरो चार्ल्सा मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगी।' घोड़े की रास सम्हालते हुए चार्ल्स ने कहा, 'नहीं लुइजा, नहीं, तुम नहीं जानती हो स्पेन की आजकल क्या दशा है? कोई भी किसी का पुरसाहाल नहीं। घंटे-घंटे पर मन-मन के गोले आसमान से बरसा करते हैं। तुम नादानी मत करो। मैं शीघ्र फ़िलिप्स का पता लगाकर यदि संभव हो सका तो साथ लेकर लौट आऊँगा। तुम यहीं पर मेरी प्रतीक्षा करो।' लुइजा चाहती थी कि उसे रोक ले; परन्तु जब तक चार्ल्स अपना वाक्य पूरा करे तब तक उसका घोड़ा लुइजा ने देखा, काफी दूर जा चुका था। वह चुप हो गई। परन्तु उसने अपना कर्तव्य निश्चित कर लिया था।

रिपरेनीज़ पहाड़ी की श्रृंखलाएँ लड़ियों की भाँति आपस में गुँथकर पूरब से पच्छिम की ओर चली गयी थीं। प्रकृति ने स्पेन और फ्रांस के परस्पर राजनीतिक संघर्ष के शान्ति रूप इस दीवार को प्रदान किया था - इन देशों के सम्बन्ध को अपने विराट विराम से पृथक करने की चेष्टा की थी। परन्तु मनुष्य ने अपने विज्ञान के बल से प्रकृति की छाती पर पत्थर रख अपना सम्बन्ध स्थापित ही रखा था। रिपरेनीज़ के पच्छिम और पूरब मानव-शक्ति की द्योतक रेल प्रकृति की पराजय पर अट्टहास करती अपने विजय के गर्व से किलकारी मारती हुई निकल जाती। परन्तु पार्वत्य प्रदेश के स्थायी निवासी दरिद्रता के कारण मानव क्रोड़ का क्रूर आलम्बन छोड़ प्रकृति की स्नेहमयी गोद के ही आश्रित थे। रिपरेनीज़ के पार करने को उन्होंने एक सीधा परन्तु बीहड़ रास्ता खोज निकाला था। पैदल या टट्टू घोड़े से भी वह सुगमता से पार किया जा सकता था। मानसिक उद्रेक में मनुष्य विलम्ब नहीं पसन्द करता। अस्तु चार्ल्स, इसी मार्ग से होकर जा रहा था। नादान लुइजा ने भी उसका अनुसरण किया।

रास्ता अनदेखा और बीहड़। फिर घोड़ा भी बड़ा। लुइजा को पग-पग पर कठिनाई हो रही थी। हर घड़ी आशंका थी कि अब गिरी कि तब गिरी। परन्तु घोड़ा भागा जा रहा था। पापा के साथ उसने सवारी बहुत की थी परन्तु इतने बीहड़ पथ पर और इतनी भयानक परिस्थति में कभी भी नहीं। उसके घुटनों में बल पड़ रहा था। अंग-अंग में पीड़ा हो रही थी। परन्तु वह रुकने का नाम नहीं ले रही थी। नाक की सीध में दौड़ी-दौड़ी चली जा रही थी। दौड़ो लुइजा, दौड़ो! प्रेम की परीक्षा बहुत कठिन होती है!

सहसा उसे ध्यान आया, स्पेन की सरहद निकट है। सीमान्त प्रदेश के रक्षक सिपाही तो होंगे ही। अगर किसी ने रोका तो - वहाँ देखा जाएगा। पिस्तौल तो है। उसने सावधानी से पिस्तौल फिर खोंस ली घोड़ा उड़ा जा रहा था और भावों से भरा हुआ उसका हृदय भविष्य के अन्धकारमय गर्भ में विचर रहा था - 'चार्ल्स अब स्पेन में पहुँच गया होगा। उसका जीवन संकट में है। घंटे भर पहले उसने कहा था, मन-मन के गोले आसमान से बरसते हें। कहीं उनमें से एक भी -' आँख की गति के साथ हृदय की गति भी द्रुत हो गयी। अनुभूति की लीक पर कल्पना की गाड़ी बढ़ निकली - 'चार्ल्स ने मेरे लिए ही अपना जीवन संकट में डाल दिया है। ऐसा वीर साहसी और दृढ़प्रतिज्ञ पुरुष मेरे ही कारण व्यर्थ की आपत्ति में फँस गया है। मैं भी कितनी अभागिनी हूँ। हे ईश्वर' लुइजा का हृदय किसी भावी आशंका से सिहर उठा। चार्ल्स...

सहानुभूति ने प्रेम का रूप धारण कर लिया था। ढाल पर घोड़ा तेज़ी से उतर रहा था। दिशा, स्थान इत्यादि का इस समय उसको कुछ भी ज्ञान नहीं था। अचानक कोई चिल्लाया। 'ठहरो! 'चौंककर लुइजा ने देखा बहुत से स्पेनिश सिपाही सड़क के एक-एक ओर खड़े थे। 'ठहरो' आदेश उन्हीं में से एक का था। पिस्तौल सम्हालते हुए वह उतर पड़ी। वह सिपाहियों की ओर बढ़ चली। वह उनसे चार्ल्स का पता भी पूछना चाहती थी। सहसा उसने अपनी बाईं तरफ़ चार्ल्स का सुपरिचित घोड़ा बँधा हुआ देखा। पूरी दृष्टि उस ओर घूम गयी। अश्व के निकट ही श्वेत वस्त्र से लिपटा एक शव पड़ा था। उसका हृदय धड़क उठा। जिस भावी आशंका से वह एक बार काँप उठी थी उससे वह फिर सिहर उठी। तेज़ी से जल्दी-जल्दी डग रखती हुई वह शव के पास पहुँच गयी। उसने चादर को हटाया। उसको मानो लकवा मार गया हो। ठगी-सी क्षण-भर खड़ी रही। उसके मुँह से एक ची़ख निकल गयी और वह संज्ञा-रहित हो गयी। शव चार्ल्स का था।

जल के छींटे पड़ने से लुइजा की मूर्च्छा भंग हुई। वह अभी उठ ही रही थी कि किसी ने पुकारा - 'लुइजा'। स्वर परिचित था। वह चौंक पड़ी। उसने घूमकर देखा सैनिक वेश में फ़िलिप्स खड़ा था। कोमल प्रश्न-सूचक शब्दों में उसने कहा - 'फ़िलिप्स?' 'हाँ लुइजा,' फ़िलिप्स ने उत्तर दिया। इसी क्षण लुइजा की दृष्टि फिर चार्ल्स के शव की ओर पड़ी। भावों के आधिक्य से निर्जीव होने पर भी चार्ल्स का मुँह यथेष्ट लाल था। उसके रक्तहीन चेहरे पर शान्ति और विजय के चिन्ह स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहे थे। उसके विशाल नेत्र खुलकर मानो अपनी भयंकर प्रतिज्ञा और उसकी भयंकर पूर्ति की गवाही दे रहे थे। लुइजा विचलित हो उठी। गंभीर स्वर में उसने पूछा। 'तुम चार्ल्स की हत्या के सम्बन्ध में कुछ जानते हो फ़िलिप्स?' 'हाँ लुइजा,' चकित होकर फ़िलिप्स ने उत्तर दिया, 'चार्ल्‍स कौन? बिना प्रवेश-पत्र के यहाँ प्रवेश निषेध है। उसी के अभाव में शासन-विधान से बाध्य हो मुझे यह दंड देना पड़ा। परन्तु इससे तुमसे क्या सम्बन्ध? तुम्हारे पिताजी कहाँ हैं? तुम आ कहाँ से रही हो?'

अन्तिम प्रश्न उसने मानो सुने ही नहीं। काँपते हुए परन्तु विस्मयात्मक शब्दों में बोली, 'चार्ल्स के हत्यारे तुम फ़िलिप्स?' फ़िलिप्स हैरान था। लुइजा भी किंकर्तव्यविमूढ़। फ़िलिप्स - उसके प्राणों का प्यारा फ़िलिप्स उसकी आँखों के सामने था और वह प्रणय के दो शब्द भी न कह सकी। कितनी विषम परिस्थिति थी। एक ओर मिलन दूसरी ओर चिर वियोग। भावों के संघर्ष ने लुइजा को पागल बना दिया था। उन्मादिनी की भाँति वह खड़ी हुई। उसने चार्ल्स के अश्व को जाकर चूमा। घोड़ा हिनहिनाया परन्तु दूसरे ही क्षण उसका माथा लटक गया मानो वह अतीत की वार्ता के कथन में असफल होने के कारण निराश हो गया हो। घोड़े को छोड़ लुइजा एक ओर निरुद्देश्य पथ पर चल पड़ी। फ़िलिप्स पुकार रहा था - 'लुइजा, लुइजा।' परन्तु वह चली जा रही थी - अनन्त की ओर - क्षितिज के उस पार - वहाँ लुइजा की अन्तरात्मा से पुकार उठ रही थी - 'चार्ल्स! चार्ल्स!'

(कहानी, बनारस)

Bhuvaneshvar Prasad Shrivastava
About the poet

Bhuvaneshvar Prasad Shrivastava भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव

भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव (जन्म: 20 जून, 1910 - मृत्यु: 1957) हिंदी के प्रसिद्ध एकांकीकार, लेखक एवं कवि थे। भुवनेश्वर साहित्य जगत् का ऐसा नाम है, जिसने अपने छोटे से जीवन काल में लीक से अलग किस्म का साहित्य सृजन किया। भुवनेश्वर ने मध्य वर्ग की विडंबनाओं को क…

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