About Bhuvaneshvar Prasad Shrivastava
भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव (जन्म: 20 जून, 1910 - मृत्यु: 1957) हिंदी के प्रसिद्ध एकांकीकार, लेखक एवं कवि थे। भुवनेश्वर साहित्य जगत् का ऐसा नाम है, जिसने अपने छोटे से जीवन काल में लीक से अलग किस्म का साहित्य सृजन किया। भुवनेश्वर ने मध्य वर्ग की विडंबनाओं को कटु सत्य के प्रतीरूप में उकेरा। उन्हें आधुनिक एकांकियों के जन…
Selected Quotes
भेड़ियों का झुंड - 200-300 जो जाड़े की रातों में निकलते हैं और सारी दुनिया की चीजें जिनकी भूख नहीं बुझा सकतीं, उनका - उन शैतानों की फौज का कोई भी मुकाबला नहीं कर सकता।सांसारिक सुख हमें प्राप्त नहीं होता, तथापि हृदय सदा आह्लादित रहता है।Poetry & Stories
भेड़िये
भेड़िया क्या है , खारू बंजारे ने कहा, मैं अकेला पनेठी से एक भेड़िया मार सकता हूं। मैंने उसका विश्वास कर लिया। खारू किसी चीज से नहीं डर सकता और हालांकि 70 के आस-पास होने और एक उम्र की गरीबी के सबब से वह बुझा-बुझा सा दिखाई पड़ता था; पर तब भी उसकी ऐसी बातों का उसके कहने के साथ ही यकीन करना पड़ता था।उसका असली नाम शायद इफ्तखार या ऐसा ही कुछ था; पर उसका लघुकरण खारू बिलकुल चस्पा होता था। उसके चारों ओर ऐसी ही दुरूह और दुर्भेद्य कठिनता थी। उसकी आंखें ठंडी और जमी हुई थीं और घनी सफेद मूंछों के नीचे उसका मुंह इतना ही अमानुषीय और निर्दय था, जितना एक चूहेदान।
आजादी : एक पत्र
वही मार्च का महीना फिर आ गया। आज शायद वही तारीख भी हो। पर मेरे लिखने का सबब इतना निकम्मा नहीं है। असल में प्यारे दोस्त, इस एक साल में मेरे साथ कुछ ऐसा घट गया है कि अब जब कई बार टाल चुकने के बाद मैं तुम्हें लिख रही हूँ, ऐसा हौसला होता है कि मुझे इससे कहीं पहले लिखना चाहिए था। बहरहाल, तुमने इस साल भर चुप रहकर उस समझदारी का सबूत दिया है जो हमीं लोग, हम जो इतने सबसे गु़जर चुके हैं, समझ सकते हैं।वह स्टूडेंट जिसने उस शाम को इसाडोरा डंकन के फैशन में बहुत सी खट्टी-मिट्ठी बातें की थीं, पिछले सितम्बर में अचानक मर गई। हॉस्टल छोड़ने के कुछ दिन पहले उसने अपनी खिड़की में नागफनी का एक गमला लाकर रखा था और राम जाने मजाक या किसी गहरे दयनीय विकार में ठीक हमारे पुरखों की तरह उसे पूजना शुरू कर दिया था। फिर एक दिन वह अचानक खफीफ-सी बीमार होकर घर चली गई और करीब एक महीने बाद सुबह हम लोगों ने देखा कि हाउस मेड के पीछे एक काउब्वाय फिल्मों के मनमौजियों की तरह का आदमी उसके कमरे में से निकल रहा है। वह उसका बाप था जो उसकी चीज वस्तु लेने आया था। सो हमारी नन्हीं इसाडोरा डंकन की मौत इस तरह हुई और मेरा ख्याल है कि इस मौत के सिवा कोई भी उसके मौजूँ न थी। क्या तुम महसूस नहीं करते कि अक्सर हम न अपनी जिन्दगी जीते हैं और न अपनी मौत मरते हैं। अस्पताल के खैराती कपड़ों की-सी जिन् दगी न हम पर फबती है, न फिट ही होती है और हालाँकि वह साफ और धुली होती है; क्लोरोफार्म की बदबू की तरह मौत उसमें बसी रहती है। मैं बाज मर्तबा महसूस करती हूँ कि हमारी सबसे बड़ी ट्रेजेडी यह नहीं है कि हम अपनी जिन् दगी नहीं जीते; बल्कि हम अपनी मौत नहीं मरते। क्योंकि यह सि़र्फ मौत है जो जिन् दगी के ओछेपन को असम्बद्ध और बेकार घटनाओं के ढेर को एक मानी देती है। मैं जानता हूँ, आप जरूर इसे अंदोलस्ते सोफिस्त्री कहेंगे। मुझे याद है, तुमने जो कहा था कि मैटर में न कुछ पैदा होता है और न कुछ मरता है। आदमी ने खुद पैमाइश और मौत बनाई है कि वह इस कवित्व से अपने-आप को बरतरी दे।
एक रात
इस आज , कल , अब , जब , तब से सम्पूर्ण असहयोग कर यदि कोई सोचे क्या, खीज उठे कि इतना सब कुछ निगलकर - सहन कर इस हास्यास्पद बालि ने काल को क्यों बाँधा। इस भूत , भविष्य , वर्तमान का कार्ड - हाउस क्यों खड़ा किया, हाँ, यदि सोचे क्या, खीज उठे कि कछुए के समान सब कुछ अपने में समेटे वर्तमान कितना शीतल और कठोर है और फिर उसे देखे, उसे क्यों, सृजन के इस अन्ध विपुल जन-संघात से किसी एक कृति को उठाकर माइक्रोस्कोपिक विज्ञता में पिघला दे; पर उसी को क्यों न देखे। हाँ, उसका - स्त्री का - शरीर, उसका नाम, उसका हर रूपेण सुरक्षित होना देखे और खीज उठे।पर खीज क्यों उठे? आखि र क्यों? क्या खीज जाना इतना अन्तिम है? क्या उसके बिना ट्रेजडी बरबस एक असुन्दरता से खिलखिला ही उठेगी। यह सच है, वह विज्ञान के अपरिवर्तनशील नियम से द्रव के समान जीवन के साँचे में पड़ते ही ढल गई।, उसने एक पुरुष से प्रेम किया, दूसरे से विवाह किया, एक का हृदय तोड़ दिया, और उसका फोटो चूमा, दूसरे से अधिक - अत्यधिक निकट आकर विकृत कर दिया और यदि उसके ऊपर सुरक्षित काई आँसू बहानेवाला होगा, तो वह अवश्य हँस दिया होगा।
जीवन की झलक
बाल पक गए हैं। सामने के दो दाँत निकम्मे हो गए हैं। पर, शरीर पर झुर्रियाँ अभी तक नहीं आई हैं। मेरी उम्र के 65 वर्ष 6 महीने २ दिन बीत चुके हैं, आज तीसरा दिन है। सिर में धीमा-धीमा दर्द हो रहा है। युवावस्था में मैंने काशी के एक ज्योतिषी को अपना हाथ दिखाया था। उसने कहा था - तुम्हारी उम्र 65 वर्ष 6 महीने 3 दिन की है। उसके कथनानुसार आज मेरी जीवन-यात्रा का अन्तिम दिवस है। मुझे भी पूर्ण विश्वास है कि आज मेरे प्राण पखेरू उड़ जायेंगे। इस माया-महल से आज हमें छुटकारा मिल जाएगा। मैंने संसार देखा और खूब अच्छी तरह देखा। कुछ दिन पहले मैं बड़े आराम से अपनी जिन्दगी बसर करता था। सैकड़ों आदमी हमारे पीछे चला करते थे। बड़े-बड़े लोगों तक मेरी पहुँच थी। सारा शहर मेरी प्रशंसा करता था; परन्तु आज मेरे अभिन्न-हृदय मित्रगण कपूर की तरह न जाने किस हवा में विलीन हो गए। मेरे रिश्तेदार - जो महीने में एक बार मेरे घर अवश्य पधारते थे - इन कई वर्षों से मुझे पहचानते भी नहीं। रास्ते में कहीं मुलाकात होती है, तो वे अपना सिर नीचा कर लेते है। कुछ दिन पहले जो मेरी जी-हुजूरी करते थे, आज वे मेरी परछाईं से भागते हैं, परन्तु आज भी मैं आनन्दित हूँ। सांसारिक सुख हमें प्राप्त नहीं होता, तथापि हृदय सदा आह्लादित रहता है। भर पेट अन्न भी मुझे नहीं मिलता; परन्तु मैं बहुत से धनी-मानी लोगों से अधिक सुखी हुँ। मेरे सुख का केन्द्र वही देवी है, जिसकी बाईं जाँघ पर मैं सिर रखकर लेटा हूँ। उसने सुख तथा दुख में साथ दिया है; बल्कि इस दुख की घड़ी में वह पहले से अधिक स्नेह रखती है। वह मेरी धर्मपत्नी है। मेरी शादी हुए 45 वर्ष हो गए। उसने मुझे सदा प्रसन्न रखा, मैं भी सदा इसे प्रसन्न रखने की कोशिश करता था।आज जब मैं जीवन की अन्तिम साँसें गिन रहा हूँ, अतीत जीवन की बहुत-सी घटनाएँ आँखों के निकट घूम रही हैं। मेरे जीवन की प्रत्येक घटना नए सिरे से फिर एक बार घटित हो रही है। मैं माता-पिता का इकलौता पुत्र था। लाड़-प्यार में पला था। पिताजी ने कभी मुझे डाँटा भी न था। मैं नहीं जानता; पर माँ कहती थी उन्होंने मुझे एक बार दो तमाचे लगाए थे। मैं घंटों रोता रहा था, और जब पिताजी आए उन्होंने माँ को डाँटा, तो मैं चुप हुआ। कुछ दिनों के बाद मैं बाहर पढ़ने के लिए भेजा गया। पढ़ने में भी मैं कुछ खराब न था। बराबर फर्स् ट, सेकेंड होता ही था। उस समय की एक घटना उल्लेखनीय है। मैंने किशोरावस्था में पदार्पण किया था। हृदय उमंग से भरा रहता था, संसार हरा नजर आता था। इसी समय एक नवकिशोरी से मेरी घनिष्ठता हो गयी। मैं उसे बहुत चाहता था। वह भी मुझे बहुत चाहती थी। मेरे भाव पवित्र थे। मैं किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए उसे प्यार नहीं करता था, परन्तु प्यार अवश्य करता था। वह मेरी ही उम्र की थी। बड़ी तीक्ष्ण-बुद्धि थी। शायद उसकी बुद्धि की तीक्ष्णता ही ने मुझे अपनी ओर खींचा था। वह बहुत सुन्दर न थी। मैं आज तक उसे भूल न सका हूँ। मैं नहीं जानता, वह जीवित है या नहीं। मेरी हार्दिक इच्छा है परमात्मा उसे सुखी रखे। धीरे-धीरे हम लोगों का हृदय प्रेम की ओर अग्रसर होने लगा। अब मुझमें कुछ सोचने की शक्ति आ गयी थी। मैं कभी-कभी सोचा करता यदि हम लोग विवाह-सूत्र में बँध जाएँ, तो हमारा जीवन कितना सुखी हो जाए। एक दिन की बात भुलाए नहीं भूलती। उस समय का प्रत्येक दृश्य स्पष्ट तथा मेरी आँखों के सामने प्रस्तुत है। हम दोनों अकेले थे। मैं खड़ा था और मेरे सामने वह खड़ी थी। हम लोग दोनों हाथ से पंजा लड़ा रहे थे। बहुत दिनों से हम लोग साथ खेलते थे, परन्तु उस दिन मैंने जैसे ही अपना हाथ उसके हाथों में दिया कि सारे शरीर में विचित्र-सी गुदगुदी होने लगी। नस-नस में एक बिजली-सी दौड़ गई। मैंने अपना हाथ छुड़ा लिया। उसके मुखमण्डल की ओर दृष्टिपात किया, तो देखता हूँ उसके मुख पर फीका गुलाबी रंग चढ़ गया है। मैं इस आकस्मिक परिवर्तन को न समझ सका। उसने युवावस्था में पैर रखा था। उसके विवाह की बातचीत होने लगी। मैं चाहता था उसकी शादी मुझसे ही हो। शायद वह भी मुझसे विवाह करना चाहती होगी; परन्तु न मैंने ही उससे कुछ कहा, न उसी ने कुछ कहा। प्रेम की अभिव्यक्ति कभी नहीं हुई यह मूक प्रेम था। उसका विवाह हो गया। मुझसे नहीं, दूसरे से। मैं निर्धन था। उसके माता-पिता ने मुझसे विवाह करने की कभी सोची भी नहीं होगी; परन्तु मेरी धर्मपत्नी होकर जितना आन्तरिक सुख उसे होता, वह हम दोनों के सिवा कौन जान सकता था। उसका पति सुन्दर था। मैं समझता था कि वह सुखी होगी। मैं भी उसके सुख में अपने को सुखी समझता था; परन्तु मैं भ्रम में था, वह सुखी नहीं थी - उसके दिन बहुत दुख से कट रहे थे। उसे मानसिक दुख था, शारीरिक नहीं। मेरा विवाह अभी नहीं हुआ था। एक दिन उससे भेंट हुई। उसने कहा - तुम अपना विवाह कर लो। मैं कुछ कह न सका। फिर एक-दो वर्ष व्यतीत हो गये। एक दिन मैं उससे मिलने गया। उसके प्रति अब मेरे भाव निर्मल तथा पवित्र थे। मैंने कभी बुरी भावना से उसकी ओर नहीं देखा। उस दिन उससे बातचीत कर उसकी फुलवाड़ी में चला गया। खाने के लिए कुछ फल खोजने लगा; परन्तु कहीं कुछ नजर न आया।
डाकमुंशी
कठिन पथ पर चले हुए श्रमित यात्रियों के समान एक इमली की सघन छाया में, जहाँ दो सड़कें मिली थीं, वहाँ वह कब से बैठता था, यह बतलाना कठिन है। कहानियों की भाषा में उसे अनन्त काल कहा जा सकता है; पर उसके चारों ओर एक ऐसा प्रचुर विश्राम था कि उसे देखकर ही सारी कल्पना जड़ हो जाती थी। जैसे - वह तरल कल्पना के अन्तिम बिन्दु पर पहुँचकर उसका एक दृढ़ और कटु उपहास कर रहा हो।झुकी हुई कमर, नागफनी का डंडा, मैली अचकन, डोरों से बँधी हुई ऐनक, बगल में बस्ता दबाए हुए वह आता और अपने मैले लाल-काले धब्बों के बिस्तर पर कुछ मनीऑर्डर फॉर्म, कुछ सादे लिफाफे कुछ पुराने खत और तस्वीरों वाले अखबार लेकर बैठ जाता।
About Bhuvaneshvar Prasad Shrivastava
भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव (जन्म: 20 जून, 1910 - मृत्यु: 1957) हिंदी के प्रसिद्ध एकांकीकार, लेखक एवं कवि थे। भुवनेश्वर साहित्य जगत् का ऐसा नाम है, जिसने अपने छोटे से जीवन काल में लीक से अलग किस्म का साहित्य सृजन किया। भुवनेश्वर ने मध्य वर्ग की विडंबनाओं को कटु सत्य के प्रतीरूप में उकेरा। उन्हें आधुनिक एकांकियों के जनक होने का गौरव भी हासिल है। एकांकी, कहानी, कविता, समीक्षा जैसी कई विधाओं में भुवनेश्वर ने साहित्य को नए तेवर वाली रचनाएं दीं। एक ऐसा साहित्यकार जिसने अपनी रचनाओं से आधुनिक संवेदनाओं की नई परिपाटी विकसित की। प्रेमचंद जैसे साहित्यकार ने उनको भविष्य का रचनाकार माना था। इसकी एक ख़ास वजह यह थी कि भुवनेश्वर अपने रचनाकाल से बहुत आगे की सोच के रचनाकार थे। उनकी रचनायों में कलातीतता का बोध है, परन्तु आश्चर्यजनक रूप से यह भूतकाल से न जुड़ कर भविष्य के साथ ज्यादा प्रासंगिक नज़र आती हैं। ‘कारवां’ की भूमिका में स्वयं भुवनेश्वर ने लिखा है कि ‘विवेक और तर्क तीसरी श्रेणी के कलाकारों के चोर दरवाज़े हैं”। उनका यह मानना उनकी रचनाओं में स्पष्टतया द्रष्टिगोचर भी होता भी है। इंसान को वस्तु में बदलते जाने की जो तस्वीर उन्होंने उकेरी, वो आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है।
Bhuvaneshvar Prasad Shrivastava: Quick Answers
Who is Bhuvaneshvar Prasad Shrivastava?
भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव (जन्म: 20 जून, 1910 - मृत्यु: 1957) हिंदी के प्रसिद्ध एकांकीकार, लेखक एवं कवि थे। भुवनेश्वर साहित्य जगत् का ऐसा नाम है, जिसने अपने छोटे से जीवन काल में लीक से अलग किस्म का साहित्य सृजन किया।
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Poems & Stories by Bhuvaneshvar Prasad Shrivastava
भेड़िये
भेड़िया क्या है , खारू बंजारे ने कहा, मैं अकेला पनेठी से एक भेड़िया मार सकता हूं। मैंने उसका विश्वास कर लिया। खारू किसी चीज से नहीं डर सकता और हालांकि 70 के आस-पास होने और एक उम्र की गरीबी के सबब से वह बुझा-बुझा सा दिखाई पड़ता था; पर तब भी उसकी ऐसी बातों का उसके कहने के साथ ही यकीन करना पड़ता था।उसका असली नाम शायद इफ्तखार या ऐसा ही कुछ था; पर उसका लघुकरण खारू बिलकुल चस्पा होता था। उसके चारों ओर ऐसी ही दुरूह और दुर्भेद्य कठिनता थी। उसकी आंखें ठंडी और जमी हुई थीं और घनी सफेद मूंछों के नीचे उसका मुंह इतना ही अमानुषीय और निर्दय था, जितना एक चूहेदान।
आजादी : एक पत्र
वही मार्च का महीना फिर आ गया। आज शायद वही तारीख भी हो। पर मेरे लिखने का सबब इतना निकम्मा नहीं है। असल में प्यारे दोस्त, इस एक साल में मेरे साथ कुछ ऐसा घट गया है कि अब जब कई बार टाल चुकने के बाद मैं तुम्हें लिख रही हूँ, ऐसा हौसला होता है कि मुझे इससे कहीं पहले लिखना चाहिए था। बहरहाल, तुमने इस साल भर चुप रहकर उस समझदारी का सबूत दिया है जो हमीं लोग, हम जो इतने सबसे गु़जर चुके हैं, समझ सकते हैं।वह स्टूडेंट जिसने उस शाम को इसाडोरा डंकन के फैशन में बहुत सी खट्टी-मिट्ठी बातें की थीं, पिछले सितम्बर में अचानक मर गई। हॉस्टल छोड़ने के कुछ दिन पहले उसने अपनी खिड़की में नागफनी का एक गमला लाकर रखा था और राम जाने मजाक या किसी गहरे दयनीय विकार में ठीक हमारे पुरखों की तरह उसे पूजना शुरू कर दिया था। फिर एक दिन वह अचानक खफीफ-सी बीमार होकर घर चली गई और करीब एक महीने बाद सुबह हम लोगों ने देखा कि हाउस मेड के पीछे एक काउब्वाय फिल्मों के मनमौजियों की तरह का आदमी उसके कमरे में से निकल रहा है। वह उसका बाप था जो उसकी चीज वस्तु लेने आया था। सो हमारी नन्हीं इसाडोरा डंकन की मौत इस तरह हुई और मेरा ख्याल है कि इस मौत के सिवा कोई भी उसके मौजूँ न थी। क्या तुम महसूस नहीं करते कि अक्सर हम न अपनी जिन्दगी जीते हैं और न अपनी मौत मरते हैं। अस्पताल के खैराती कपड़ों की-सी जिन् दगी न हम पर फबती है, न फिट ही होती है और हालाँकि वह साफ और धुली होती है; क्लोरोफार्म की बदबू की तरह मौत उसमें बसी रहती है। मैं बाज मर्तबा महसूस करती हूँ कि हमारी सबसे बड़ी ट्रेजेडी यह नहीं है कि हम अपनी जिन् दगी नहीं जीते; बल्कि हम अपनी मौत नहीं मरते। क्योंकि यह सि़र्फ मौत है जो जिन् दगी के ओछेपन को असम्बद्ध और बेकार घटनाओं के ढेर को एक मानी देती है। मैं जानता हूँ, आप जरूर इसे अंदोलस्ते सोफिस्त्री कहेंगे। मुझे याद है, तुमने जो कहा था कि मैटर में न कुछ पैदा होता है और न कुछ मरता है। आदमी ने खुद पैमाइश और मौत बनाई है कि वह इस कवित्व से अपने-आप को बरतरी दे।
एक रात
इस आज , कल , अब , जब , तब से सम्पूर्ण असहयोग कर यदि कोई सोचे क्या, खीज उठे कि इतना सब कुछ निगलकर - सहन कर इस हास्यास्पद बालि ने काल को क्यों बाँधा। इस भूत , भविष्य , वर्तमान का कार्ड - हाउस क्यों खड़ा किया, हाँ, यदि सोचे क्या, खीज उठे कि कछुए के समान सब कुछ अपने में समेटे वर्तमान कितना शीतल और कठोर है और फिर उसे देखे, उसे क्यों, सृजन के इस अन्ध विपुल जन-संघात से किसी एक कृति को उठाकर माइक्रोस्कोपिक विज्ञता में पिघला दे; पर उसी को क्यों न देखे। हाँ, उसका - स्त्री का - शरीर, उसका नाम, उसका हर रूपेण सुरक्षित होना देखे और खीज उठे।पर खीज क्यों उठे? आखि र क्यों? क्या खीज जाना इतना अन्तिम है? क्या उसके बिना ट्रेजडी बरबस एक असुन्दरता से खिलखिला ही उठेगी। यह सच है, वह विज्ञान के अपरिवर्तनशील नियम से द्रव के समान जीवन के साँचे में पड़ते ही ढल गई।, उसने एक पुरुष से प्रेम किया, दूसरे से विवाह किया, एक का हृदय तोड़ दिया, और उसका फोटो चूमा, दूसरे से अधिक - अत्यधिक निकट आकर विकृत कर दिया और यदि उसके ऊपर सुरक्षित काई आँसू बहानेवाला होगा, तो वह अवश्य हँस दिया होगा।
जीवन की झलक
बाल पक गए हैं। सामने के दो दाँत निकम्मे हो गए हैं। पर, शरीर पर झुर्रियाँ अभी तक नहीं आई हैं। मेरी उम्र के 65 वर्ष 6 महीने २ दिन बीत चुके हैं, आज तीसरा दिन है। सिर में धीमा-धीमा दर्द हो रहा है। युवावस्था में मैंने काशी के एक ज्योतिषी को अपना हाथ दिखाया था। उसने कहा था - तुम्हारी उम्र 65 वर्ष 6 महीने 3 दिन की है। उसके कथनानुसार आज मेरी जीवन-यात्रा का अन्तिम दिवस है। मुझे भी पूर्ण विश्वास है कि आज मेरे प्राण पखेरू उड़ जायेंगे। इस माया-महल से आज हमें छुटकारा मिल जाएगा। मैंने संसार देखा और खूब अच्छी तरह देखा। कुछ दिन पहले मैं बड़े आराम से अपनी जिन्दगी बसर करता था। सैकड़ों आदमी हमारे पीछे चला करते थे। बड़े-बड़े लोगों तक मेरी पहुँच थी। सारा शहर मेरी प्रशंसा करता था; परन्तु आज मेरे अभिन्न-हृदय मित्रगण कपूर की तरह न जाने किस हवा में विलीन हो गए। मेरे रिश्तेदार - जो महीने में एक बार मेरे घर अवश्य पधारते थे - इन कई वर्षों से मुझे पहचानते भी नहीं। रास्ते में कहीं मुलाकात होती है, तो वे अपना सिर नीचा कर लेते है। कुछ दिन पहले जो मेरी जी-हुजूरी करते थे, आज वे मेरी परछाईं से भागते हैं, परन्तु आज भी मैं आनन्दित हूँ। सांसारिक सुख हमें प्राप्त नहीं होता, तथापि हृदय सदा आह्लादित रहता है। भर पेट अन्न भी मुझे नहीं मिलता; परन्तु मैं बहुत से धनी-मानी लोगों से अधिक सुखी हुँ। मेरे सुख का केन्द्र वही देवी है, जिसकी बाईं जाँघ पर मैं सिर रखकर लेटा हूँ। उसने सुख तथा दुख में साथ दिया है; बल्कि इस दुख की घड़ी में वह पहले से अधिक स्नेह रखती है। वह मेरी धर्मपत्नी है। मेरी शादी हुए 45 वर्ष हो गए। उसने मुझे सदा प्रसन्न रखा, मैं भी सदा इसे प्रसन्न रखने की कोशिश करता था।आज जब मैं जीवन की अन्तिम साँसें गिन रहा हूँ, अतीत जीवन की बहुत-सी घटनाएँ आँखों के निकट घूम रही हैं। मेरे जीवन की प्रत्येक घटना नए सिरे से फिर एक बार घटित हो रही है। मैं माता-पिता का इकलौता पुत्र था। लाड़-प्यार में पला था। पिताजी ने कभी मुझे डाँटा भी न था। मैं नहीं जानता; पर माँ कहती थी उन्होंने मुझे एक बार दो तमाचे लगाए थे। मैं घंटों रोता रहा था, और जब पिताजी आए उन्होंने माँ को डाँटा, तो मैं चुप हुआ। कुछ दिनों के बाद मैं बाहर पढ़ने के लिए भेजा गया। पढ़ने में भी मैं कुछ खराब न था। बराबर फर्स् ट, सेकेंड होता ही था। उस समय की एक घटना उल्लेखनीय है। मैंने किशोरावस्था में पदार्पण किया था। हृदय उमंग से भरा रहता था, संसार हरा नजर आता था। इसी समय एक नवकिशोरी से मेरी घनिष्ठता हो गयी। मैं उसे बहुत चाहता था। वह भी मुझे बहुत चाहती थी। मेरे भाव पवित्र थे। मैं किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए उसे प्यार नहीं करता था, परन्तु प्यार अवश्य करता था। वह मेरी ही उम्र की थी। बड़ी तीक्ष्ण-बुद्धि थी। शायद उसकी बुद्धि की तीक्ष्णता ही ने मुझे अपनी ओर खींचा था। वह बहुत सुन्दर न थी। मैं आज तक उसे भूल न सका हूँ। मैं नहीं जानता, वह जीवित है या नहीं। मेरी हार्दिक इच्छा है परमात्मा उसे सुखी रखे। धीरे-धीरे हम लोगों का हृदय प्रेम की ओर अग्रसर होने लगा। अब मुझमें कुछ सोचने की शक्ति आ गयी थी। मैं कभी-कभी सोचा करता यदि हम लोग विवाह-सूत्र में बँध जाएँ, तो हमारा जीवन कितना सुखी हो जाए। एक दिन की बात भुलाए नहीं भूलती। उस समय का प्रत्येक दृश्य स्पष्ट तथा मेरी आँखों के सामने प्रस्तुत है। हम दोनों अकेले थे। मैं खड़ा था और मेरे सामने वह खड़ी थी। हम लोग दोनों हाथ से पंजा लड़ा रहे थे। बहुत दिनों से हम लोग साथ खेलते थे, परन्तु उस दिन मैंने जैसे ही अपना हाथ उसके हाथों में दिया कि सारे शरीर में विचित्र-सी गुदगुदी होने लगी। नस-नस में एक बिजली-सी दौड़ गई। मैंने अपना हाथ छुड़ा लिया। उसके मुखमण्डल की ओर दृष्टिपात किया, तो देखता हूँ उसके मुख पर फीका गुलाबी रंग चढ़ गया है। मैं इस आकस्मिक परिवर्तन को न समझ सका। उसने युवावस्था में पैर रखा था। उसके विवाह की बातचीत होने लगी। मैं चाहता था उसकी शादी मुझसे ही हो। शायद वह भी मुझसे विवाह करना चाहती होगी; परन्तु न मैंने ही उससे कुछ कहा, न उसी ने कुछ कहा। प्रेम की अभिव्यक्ति कभी नहीं हुई यह मूक प्रेम था। उसका विवाह हो गया। मुझसे नहीं, दूसरे से। मैं निर्धन था। उसके माता-पिता ने मुझसे विवाह करने की कभी सोची भी नहीं होगी; परन्तु मेरी धर्मपत्नी होकर जितना आन्तरिक सुख उसे होता, वह हम दोनों के सिवा कौन जान सकता था। उसका पति सुन्दर था। मैं समझता था कि वह सुखी होगी। मैं भी उसके सुख में अपने को सुखी समझता था; परन्तु मैं भ्रम में था, वह सुखी नहीं थी - उसके दिन बहुत दुख से कट रहे थे। उसे मानसिक दुख था, शारीरिक नहीं। मेरा विवाह अभी नहीं हुआ था। एक दिन उससे भेंट हुई। उसने कहा - तुम अपना विवाह कर लो। मैं कुछ कह न सका। फिर एक-दो वर्ष व्यतीत हो गये। एक दिन मैं उससे मिलने गया। उसके प्रति अब मेरे भाव निर्मल तथा पवित्र थे। मैंने कभी बुरी भावना से उसकी ओर नहीं देखा। उस दिन उससे बातचीत कर उसकी फुलवाड़ी में चला गया। खाने के लिए कुछ फल खोजने लगा; परन्तु कहीं कुछ नजर न आया।
डाकमुंशी
कठिन पथ पर चले हुए श्रमित यात्रियों के समान एक इमली की सघन छाया में, जहाँ दो सड़कें मिली थीं, वहाँ वह कब से बैठता था, यह बतलाना कठिन है। कहानियों की भाषा में उसे अनन्त काल कहा जा सकता है; पर उसके चारों ओर एक ऐसा प्रचुर विश्राम था कि उसे देखकर ही सारी कल्पना जड़ हो जाती थी। जैसे - वह तरल कल्पना के अन्तिम बिन्दु पर पहुँचकर उसका एक दृढ़ और कटु उपहास कर रहा हो।झुकी हुई कमर, नागफनी का डंडा, मैली अचकन, डोरों से बँधी हुई ऐनक, बगल में बस्ता दबाए हुए वह आता और अपने मैले लाल-काले धब्बों के बिस्तर पर कुछ मनीऑर्डर फॉर्म, कुछ सादे लिफाफे कुछ पुराने खत और तस्वीरों वाले अखबार लेकर बैठ जाता।
भविष्य के गर्भ में
सन्ध्या का समय था। भास्कर की ज्योति दिन-भर चमक लेने पर धूमिल हो गयी थी। वे प्रस्थान की तैयारी कर रहे थे। विहग-वृन्द इस विदाई के अवसर पर मंगल गान गा रहे थे।वायु फिर भी गंभीरता से चल रही थी। ऐसे अवसर पर सुखी आदमियों का सुख और दुखियों का दुख और भी बढ़ जाता है। एक उद्यान में लुइजा अपने पिता की समाधि के सामने एक
माँ-बेटे
चारपाई को घेरकर बैठे हुए उन सब लोगों ने एक साथ एक गहरी साँस ली। वह सब थके-हारे हुए खामोश थे। कमरे में पूरी खामोशी थी, मरने वाले की साँस भी थकी हुई-सी हारी हुई थी। तीन दिन से वह सब मौत की लड़ाई देख रहे थे और उसकी जीत का इन्तजार कर रहे थे। पड़ोस के लोग खाली वक्त में आते, दरवाजे में घुसते ही मुँह सुखाकर किसी एक से धीमी आवाज में पूछते - डॉक्टर क्या कहता है? या ऐसी ही और कुछ कह, मरने वाले का बुझा हुआ खाली मुँह देखकर सलाह या आलोचना के कुछ लफ्ज कह चले जाते। वह सब दुनिया के साथ घूम रहे थे। सिर्फ मरने वाला धीरे-धीरे तेजी से अलग हो रहा था। चारपाई को घेरकर बैठने वाले, दुनिया में ऐसे वक्त जो होता आया है, कर रहे थे और जो दुनिया में होता आया है उसके लिए तैयार थे या तैयार हो रहे थे। मरनेवाली उनकी माँ, नानी और दादी ही तो थी।बड़ी लड़की कुच्ची गो भाई के दो खतों पर नहीं, उसकी लड़की को बच्चा होने वाला था, पर तार पाते ही अपनी लड़की को लेकर चली आई। बड़ा लड़का रेलवे की नौकरी में रात की ड्यूटी करता है, उसके लिए सुबह पराँठे कौन और कैसे बनाता होगा, छोटा लड़का अब तो फलाश की बैठक नहीं जमाता है, इससे माँ की बीमारी या मौत से उसका कोई रिश्ता है, यह वह कभी-कभी जानना चाहती है। छोटी अभी जवान है, अभी तीन साल हुए उसकी शादी हुई है। छोटी भाभी से बड़ी की चुगली खाती आई है, आज भी खाती है। माँ की बीमारी या मरने का अवसर वहाँ किस तरह पड़ रहा है, न जानती है, न जानना चाहती है। बड़ा लड़का अधेड़ हो चला है, घर से अलग हो गया था, उसकी बीबी को अलग चूल्हा जलाते आज सत्रह साल हो गए, मरनेवाली से उससे हजार शिकायतें हैं आज वह उन्हें भूल जाना चाहती है। बीमारी के खर्चे और शायद श्राद्ध में भी आधा देने को तैयार है, पर वह छोटे के हाथ में रुपया न देगी। कौन उससे झगड़ा मोल ले! न, वह इस झगड़े में न पड़ेगी। छोटी बहू पाँचवीं बार यह कहने के लिए बेताब है कि बड़ी बहू कल शाम को रोते हुए बच्चे का झूठा बहाना कर सो गई। सिविल सर्जन को वह बुला लेती पर बड़ी बार-बार ‘सिविल सर्जन-सिविल सर्जन’ क्यों चिल्ला रही है? क्या उनके सिवाय यहाँ सब देहाती, गधे ही हैं? दोनों लड़के एक-दूसरे से काफी अरसे से दूर रह चुके हैं, आज एक साथ पाकर कुछ अजब-सा जान रहे हैं। थर्मामीटर दोनों एक साथ देखते हैं, दवा की खुराक दोनों एक साथ देखते हैं। बैद जी से दोनों बातें करना चाहते हैं। इनके अलावे बच्चे हैं, उनके माँ-बाप उन्हें घेर-घेरकर कहते हैं बेटे, बेटी! नानी-दादी जा रही हैं देख लो, मरने वाली के कान के पास कहते हैं - अम्मा! पोता, नाती, पैर छू रहे हैं, असीस दो। मरनेवाली आँखें चौड़ी करती है और कुछ बुदबुदाती है। वही अकेली तो मर रही है। वही अकेली तो जोती जा रही है। पछत्तर साल कड़ाके की गरमी, जाड़े, बरसात में जो जीवन कड़ा और स्थिर हो चुका है, आज वह फिर बिखर रहा है!
मास्टरनी
उस रोज सुबह से पानी बरस रहा था। साँझ तक वह पहाड़ी बस्ती एक अपार और पीले धुँधलके में डूब-सी गयी थी। छिपे हुए सुनसान रास्ते, बदनुमा खेत, छोटे-छोटे एकरस मकान - सब उस पीली धुन्ध के साथ मिलकर जैसे एकाकार हो गए थे।औरतें घरों के दरवाजे बन्द किए सूत सुलझा रही थीं। आदमी पास के एक गाँव में गए थे। वहाँ मिशन का क्वार्टर था और एक भट्टी। वाकई, वहाँ बारिश की धीमी, एकरस और मुलायम छपाछप की कोई आवाज नहीं आ रही थी।
मौसी
मानव-जीवन के विकास में एक स्थल ऐसा आता है, जब वह परिवर्तन पर भी विजय पा लेता है। जब हमारे जीवन का उत्थान या पतन, न हमारे लिए कुछ विशेषता रखता है, न दूसरोंके लिए कुछ कुतूहल। जब हम केवल जीवित के लिए ही जीवित रहते हैं और वह मौत आती है; पर नहीं आती।
लड़ाई
चाँदपुर से गाड़ी पूरे पच्चीस मिनट लेट चली। पी.डब्ल्यू.आई. की ट्रॉली लद रही थी और स्टेशन मास्टर की दयनीय निकम्मी शकल हमारी खिड़की के सामने से निकल गई। खद्दरपोश ने अपना अखबार महारत से मोड़कर उससे हवा करते हुए खिड़की के बाहर मुँह निकाल लिया। तीसरी बार गोरखे सोल्जर ने अपना सामान ऊपर से उतारकर फिर से लगाना शुरू किया। ऊँचे-ऊँचे फौजी बैग जिसमें ताले लग सकते थे, पीले बेलबूटोंवाला ट्रंक जिसके बेलबूटे मैले हो चले थे, चमड़े की पेटियों से बँधा हुआ बिस्तरा और नेपाली टोकरा, वह शायद छुट्टी से वापस जा रहा था - बंदूक को पोंछकर उसे रखने के लिए वह धीरे-धीरे बुदबुदाकर ‘मंजिल और बट्स’ पढ़ रहा था - वह बंदूक इस तरह थामे था जैसे कोई दरिन्दा हो जिसे जईफी ने पालतू बना दिया है... सिगनल के इन्तजार में गाड़ी हूँ-हूँ-हूँ करती हुई खड़ी हो गयी... और पूरा डिब्बा गुनगुना उठा। बाहर दूर के दरख्त घने नीले होकर छोटी पहाड़ियों की तरह मालूम होते थे, गाड़ी की रोशनी अभी नहीं हुई थी। खद्दरपोश ने पूरा-पूरा झुककर बाहर झाँका और फिर जैसे अपने-आपसे कह दिया - ’सिगनल नहीं है।’ कोने से स्टूडेंट ने अपनी खुसटी हुई अचकन तहाकर अपने सिर के नीचे रख ली और छत की तरफ एकटक देखता हुआ धुँए के लच्छे बनाने लगा। वह विदूषकों की तरह विचित्र मुँह बनाता था। कोई अच्छा लच्छा बन जाने पर वह सामनेवाली बेंच के कोने पर बैठी हुई महिला की तरफ विजय के साथ देखता था। महिला का पति ऊँघ गया था, पर गाड़ी के रुकते ही वह चौंककर जगे रहने की कोशिश कर रहा था। चुपचाप बैठे हुए बच्चे की तरफ एक मिनट घूरकर उसने अपनी स्त्री से एकबारगी पूछा - ’’इन्दर की बऊ का बप्पा बई होगा खतौली में कि वो जागी अपने सौहरे।’’ उसकी आवाज में एक बेवजह कर्कशता थी। महिला ने अनमने गर्दन हिलाकर एक अनिश्चित-सा जवाब दिया - गाड़ी चल दी और वह पूरे-पूरे पैर साड़ी से ढँककर बाहर झाँकने लगी।खद्दरपोश ने जँभाई ली और अँगूठियोंवाली उँगलियाँ से चुटकी बजाई - चट, छट, च्छट। स्टूडेंट का सिगरेट खत्म हो चुका था और वह अपना पर्स निकाले उसके अन्दर उँगलियाँ डाले गिन रहा था।
सूर्यपूजा
अँधेरी घूप गलियों में हवा लपटों की तरह ऊँचे सीले मकानों से टकराकर एकरस हिंसक आवाज करती हुई भर-भर जाती थी।मोटा, भद्दा डॉक्टर और दुबला रोगी-सा विद्यार्थी विलास हाथ में हाथ डाले फिसलौने खड़चड़े पर खामोश चले जा रहे थे। कीचड़ से बचने के लिए वह बराबर मेढकों की तरह फुदक रहे थे...। एकबारगी विलास का पैर कीचड़ में छपक गया और वह उतावली से चिल्ला पड़ा - ’’डॉक्टर तुम मुर्दा हो, बिल्कुल मरे हुए, इससे ज्यादा कुछ भी तो नहीं। तुम जानते हो, तुम मुर्दा हो? ...मैं तुम्हें कितना चाहता हूँ, लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है, तुम तो मरे हुए हो।’’
हाय रे, मानव हृदय!
स्मृति की धुँधली और गम्भीर छाया में आज वह छोटी-सी घटना उतनी प्रखर और उत्तेजित नहीं प्रतीत होती। आज जब इस प्रकाश ह्रास और अच्छाई के संसार से भागकर उस कुरूप अन्धकार में, उस उन्माद, उस उफान के साथ नयन खोलना चाहता हूँ, तब दम घुटने लगता है। आज का अर्थ है - मेरी सफलता, मेरा साहस और असंख्य स्त्री-पुरुषों की जो मेरे साथ जीवन की रेस में दौड़े हैं - विफलता और कायरता। कम-से-कम होशहवास में अपना विश्लेषण करके मैं इसी ताव को पहुँचता हूँ। यह सत्य है या नहीं, इसकी जाँच करना अब मेरी परिधि से बाहर है। समाज मेरा आदर करता है कि मैंने नि:संकोच उसके बन्धनों और तुच्छताओं के सम्मुख सिर झुकाया है; पर एक बार, हाँ अपने उन्नति के उच्च शिखर पर बैठकर कहते हुए हृदय काँपता है। मेरी आत्मा समाज के विरोध में तड़प उठी थी पर अब वह केवल कहानी है।बीस वर्ष की बात है। मैं अपने कुछ डॉक्टर मित्रों के साथ एक छोटे-से पर्वतीय नगर में ठहरा हुआ था हम सब समवयस्क, आशावादी और समस्त चिन्ताएँ यमराज के हवाले करने वाले नवयुवक थे। दिन-रात, हास-परिहास, ताश, हाइकिं ग में कट जाता था। जीवन से आँख मिलाने का अभी किसी को अवकाश न था। एक दिन सॅंझा को जब हम लोग ताश की बाज़ी-पर-बा़ज़ी खेल रहे थे, इस दुखान्त कहानी का परदा उठा। मेरे एक विनोदी मित्र ने उसे फाटक से प्रवेश करते देखकर कहा -
Selected Quotes by Bhuvaneshvar Prasad Shrivastava (चुनिंदा उद्धरण)
भेड़ियों का झुंड - 200-300 जो जाड़े की रातों में निकलते हैं और सारी दुनिया की चीजें जिनकी भूख नहीं बुझा सकतीं, उनका - उन शैतानों की फौज का कोई भी मुकाबला नहीं कर सकता।सांसारिक सुख हमें प्राप्त नहीं होता, तथापि हृदय सदा आह्लादित रहता है।जब हम अपनी असंख्य दुखद स्मृतियाँ नष्ट करते हैं, तो स्मृति-पट से कई सुख के अवसर भी मिट जाते हैं।आज जब इस प्रकाश ह्रास और अच्छाई के संसार से भागकर उस कुरूप अन्धकार में, उस उन्माद, उस उफान के साथ नयन खोलना चाहता हूँ, तब दम घुटने लगता है।जीवन की गति जब कुछ द्रुत हो जाती है, वह एक विश्राम-सा हो जाता है।छोटा-सा कस्बा है, यहाँ हर आदमी यही समझता है कि इन डॉक्टरनी साहिबा ने किसी लावारिस लड़के को पाल लिया है।Videos on Bhuvaneshvar Prasad Shrivastava
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