Bhuvaneshvar Prasad Shrivastava, poet
Sootradhar · Author

Bhuvaneshvar Prasad Shrivastava

भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव

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About Bhuvaneshvar Prasad Shrivastava

भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव (जन्म: 20 जून, 1910 - मृत्यु: 1957) हिंदी के प्रसिद्ध एकांकीकार, लेखक एवं कवि थे। भुवनेश्वर साहित्य जगत् का ऐसा नाम है, जिसने अपने छोटे से जीवन काल में लीक से अलग किस्म का साहित्य सृजन किया। भुवनेश्वर ने मध्य वर्ग की विडंबनाओं को कटु सत्य के प्रतीरूप में उकेरा। उन्हें आधुनिक एकांकियों के जन…

Selected Quotes

भेड़ियों का झुंड - 200-300 जो जाड़े की रातों में निकलते हैं और सारी दुनिया की चीजें जिनकी भूख नहीं बुझा सकतीं, उनका - उन शैतानों की फौज का कोई भी मुकाबला नहीं कर सकता।
— भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव
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सांसारिक सुख हमें प्राप्त नहीं होता, तथापि हृदय सदा आह्लादित रहता है।
— भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव
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Poetry & Stories

  1. भेड़िये

    भेड़िया क्या है , खारू बंजारे ने कहा, मैं अकेला पनेठी से एक भेड़िया मार सकता हूं। मैंने उसका विश्वास कर लिया। खारू किसी चीज से नहीं डर सकता और हालांकि 70 के आस-पास होने और एक उम्र की गरीबी के सबब से वह बुझा-बुझा सा दिखाई पड़ता था; पर तब भी उसकी ऐसी बातों का उसके कहने के साथ ही यकीन करना पड़ता था।उसका असली नाम शायद इफ्तखार या ऐसा ही कुछ था; पर उसका लघुकरण खारू बिलकुल चस्पा होता था। उसके चारों ओर ऐसी ही दुरूह और दुर्भेद्य कठिनता थी। उसकी आंखें ठंडी और जमी हुई थीं और घनी सफेद मूंछों के नीचे उसका मुंह इतना ही अमानुषीय और निर्दय था, जितना एक चूहेदान।

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  2. आजादी : एक पत्र

    वही मार्च का महीना फिर आ गया। आज शायद वही तारीख भी हो। पर मेरे लिखने का सबब इतना निकम्मा नहीं है। असल में प्यारे दोस्त, इस एक साल में मेरे साथ कुछ ऐसा घट गया है कि अब जब कई बार टाल चुकने के बाद मैं तुम्हें लिख रही हूँ, ऐसा हौसला होता है कि मुझे इससे कहीं पहले लिखना चाहिए था। बहरहाल, तुमने इस साल भर चुप रहकर उस समझदारी का सबूत दिया है जो हमीं लोग, हम जो इतने सबसे गु़जर चुके हैं, समझ सकते हैं।वह स्टूडेंट जिसने उस शाम को इसाडोरा डंकन के फैशन में बहुत सी खट्टी-मिट्ठी बातें की थीं, पिछले सितम्बर में अचानक मर गई। हॉस्टल छोड़ने के कुछ दिन पहले उसने अपनी खिड़की में नागफनी का एक गमला लाकर रखा था और राम जाने मजाक या किसी गहरे दयनीय विकार में ठीक हमारे पुरखों की तरह उसे पूजना शुरू कर दिया था। फिर एक दिन वह अचानक खफीफ-सी बीमार होकर घर चली गई और करीब एक महीने बाद सुबह हम लोगों ने देखा कि हाउस मेड के पीछे एक काउब्वाय फिल्मों के मनमौजियों की तरह का आदमी उसके कमरे में से निकल रहा है। वह उसका बाप था जो उसकी चीज वस्तु लेने आया था। सो हमारी नन्हीं इसाडोरा डंकन की मौत इस तरह हुई और मेरा ख्याल है कि इस मौत के सिवा कोई भी उसके मौजूँ न थी। क्या तुम महसूस नहीं करते कि अक्सर हम न अपनी जिन्दगी जीते हैं और न अपनी मौत मरते हैं। अस्पताल के खैराती कपड़ों की-सी जिन् दगी न हम पर फबती है, न फिट ही होती है और हालाँकि वह साफ और धुली होती है; क्लोरोफार्म की बदबू की तरह मौत उसमें बसी रहती है। मैं बाज मर्तबा महसूस करती हूँ कि हमारी सबसे बड़ी ट्रेजेडी यह नहीं है कि हम अपनी जिन् दगी नहीं जीते; बल्कि हम अपनी मौत नहीं मरते। क्योंकि यह सि़र्फ मौत है जो जिन् दगी के ओछेपन को असम्बद्ध और बेकार घटनाओं के ढेर को एक मानी देती है। मैं जानता हूँ, आप जरूर इसे अंदोलस्ते सोफिस्त्री कहेंगे। मुझे याद है, तुमने जो कहा था कि मैटर में न कुछ पैदा होता है और न कुछ मरता है। आदमी ने खुद पैमाइश और मौत बनाई है कि वह इस कवित्व से अपने-आप को बरतरी दे।

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  3. एक रात

    इस आज , कल , अब , जब , तब से सम्पूर्ण असहयोग कर यदि कोई सोचे क्या, खीज उठे कि इतना सब कुछ निगलकर - सहन कर इस हास्यास्पद बालि ने काल को क्यों बाँधा। इस भूत , भविष्य , वर्तमान का कार्ड - हाउस क्यों खड़ा किया, हाँ, यदि सोचे क्या, खीज उठे कि कछुए के समान सब कुछ अपने में समेटे वर्तमान कितना शीतल और कठोर है और फिर उसे देखे, उसे क्यों, सृजन के इस अन्ध विपुल जन-संघात से किसी एक कृति को उठाकर माइक्रोस्कोपिक विज्ञता में पिघला दे; पर उसी को क्यों न देखे। हाँ, उसका - स्त्री का - शरीर, उसका नाम, उसका हर रूपेण सुरक्षित होना देखे और खीज उठे।पर खीज क्यों उठे? आखि र क्यों? क्या खीज जाना इतना अन्तिम है? क्या उसके बिना ट्रेजडी बरबस एक असुन्दरता से खिलखिला ही उठेगी। यह सच है, वह विज्ञान के अपरिवर्तनशील नियम से द्रव के समान जीवन के साँचे में पड़ते ही ढल गई।, उसने एक पुरुष से प्रेम किया, दूसरे से विवाह किया, एक का हृदय तोड़ दिया, और उसका फोटो चूमा, दूसरे से अधिक - अत्यधिक निकट आकर विकृत कर दिया और यदि उसके ऊपर सुरक्षित काई आँसू बहानेवाला होगा, तो वह अवश्य हँस दिया होगा।

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  4. जीवन की झलक

    बाल पक गए हैं। सामने के दो दाँत निकम्मे हो गए हैं। पर, शरीर पर झुर्रियाँ अभी तक नहीं आई हैं। मेरी उम्र के 65 वर्ष 6 महीने २ दिन बीत चुके हैं, आज तीसरा दिन है। सिर में धीमा-धीमा दर्द हो रहा है। युवावस्था में मैंने काशी के एक ज्योतिषी को अपना हाथ दिखाया था। उसने कहा था - तुम्हारी उम्र 65 वर्ष 6 महीने 3 दिन की है। उसके कथनानुसार आज मेरी जीवन-यात्रा का अन्तिम दिवस है। मुझे भी पूर्ण विश्वास है कि आज मेरे प्राण पखेरू उड़ जायेंगे। इस माया-महल से आज हमें छुटकारा मिल जाएगा। मैंने संसार देखा और खूब अच्छी तरह देखा। कुछ दिन पहले मैं बड़े आराम से अपनी जिन्दगी बसर करता था। सैकड़ों आदमी हमारे पीछे चला करते थे। बड़े-बड़े लोगों तक मेरी पहुँच थी। सारा शहर मेरी प्रशंसा करता था; परन्तु आज मेरे अभिन्न-हृदय मित्रगण कपूर की तरह न जाने किस हवा में विलीन हो गए। मेरे रिश्तेदार - जो महीने में एक बार मेरे घर अवश्य पधारते थे - इन कई वर्षों से मुझे पहचानते भी नहीं। रास्ते में कहीं मुलाकात होती है, तो वे अपना सिर नीचा कर लेते है। कुछ दिन पहले जो मेरी जी-हुजूरी करते थे, आज वे मेरी परछाईं से भागते हैं, परन्तु आज भी मैं आनन्दित हूँ। सांसारिक सुख हमें प्राप्त नहीं होता, तथापि हृदय सदा आह्लादित रहता है। भर पेट अन्न भी मुझे नहीं मिलता; परन्तु मैं बहुत से धनी-मानी लोगों से अधिक सुखी हुँ। मेरे सुख का केन्द्र वही देवी है, जिसकी बाईं जाँघ पर मैं सिर रखकर लेटा हूँ। उसने सुख तथा दुख में साथ दिया है; बल्कि इस दुख की घड़ी में वह पहले से अधिक स्नेह रखती है। वह मेरी धर्मपत्नी है। मेरी शादी हुए 45 वर्ष हो गए। उसने मुझे सदा प्रसन्न रखा, मैं भी सदा इसे प्रसन्न रखने की कोशिश करता था।आज जब मैं जीवन की अन्तिम साँसें गिन रहा हूँ, अतीत जीवन की बहुत-सी घटनाएँ आँखों के निकट घूम रही हैं। मेरे जीवन की प्रत्येक घटना नए सिरे से फिर एक बार घटित हो रही है। मैं माता-पिता का इकलौता पुत्र था। लाड़-प्यार में पला था। पिताजी ने कभी मुझे डाँटा भी न था। मैं नहीं जानता; पर माँ कहती थी उन्होंने मुझे एक बार दो तमाचे लगाए थे। मैं घंटों रोता रहा था, और जब पिताजी आए उन्होंने माँ को डाँटा, तो मैं चुप हुआ। कुछ दिनों के बाद मैं बाहर पढ़ने के लिए भेजा गया। पढ़ने में भी मैं कुछ खराब न था। बराबर फर्स् ट, सेकेंड होता ही था। उस समय की एक घटना उल्लेखनीय है। मैंने किशोरावस्था में पदार्पण किया था। हृदय उमंग से भरा रहता था, संसार हरा नजर आता था। इसी समय एक नवकिशोरी से मेरी घनिष्ठता हो गयी। मैं उसे बहुत चाहता था। वह भी मुझे बहुत चाहती थी। मेरे भाव पवित्र थे। मैं किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए उसे प्यार नहीं करता था, परन्तु प्यार अवश्य करता था। वह मेरी ही उम्र की थी। बड़ी तीक्ष्ण-बुद्धि थी। शायद उसकी बुद्धि की तीक्ष्णता ही ने मुझे अपनी ओर खींचा था। वह बहुत सुन्दर न थी। मैं आज तक उसे भूल न सका हूँ। मैं नहीं जानता, वह जीवित है या नहीं। मेरी हार्दिक इच्छा है परमात्मा उसे सुखी रखे। धीरे-धीरे हम लोगों का हृदय प्रेम की ओर अग्रसर होने लगा। अब मुझमें कुछ सोचने की शक्ति आ गयी थी। मैं कभी-कभी सोचा करता यदि हम लोग विवाह-सूत्र में बँध जाएँ, तो हमारा जीवन कितना सुखी हो जाए। एक दिन की बात भुलाए नहीं भूलती। उस समय का प्रत्येक दृश्य स्पष्ट तथा मेरी आँखों के सामने प्रस्तुत है। हम दोनों अकेले थे। मैं खड़ा था और मेरे सामने वह खड़ी थी। हम लोग दोनों हाथ से पंजा लड़ा रहे थे। बहुत दिनों से हम लोग साथ खेलते थे, परन्तु उस दिन मैंने जैसे ही अपना हाथ उसके हाथों में दिया कि सारे शरीर में विचित्र-सी गुदगुदी होने लगी। नस-नस में एक बिजली-सी दौड़ गई। मैंने अपना हाथ छुड़ा लिया। उसके मुखमण्डल की ओर दृष्टिपात किया, तो देखता हूँ उसके मुख पर फीका गुलाबी रंग चढ़ गया है। मैं इस आकस्मिक परिवर्तन को न समझ सका। उसने युवावस्था में पैर रखा था। उसके विवाह की बातचीत होने लगी। मैं चाहता था उसकी शादी मुझसे ही हो। शायद वह भी मुझसे विवाह करना चाहती होगी; परन्तु न मैंने ही उससे कुछ कहा, न उसी ने कुछ कहा। प्रेम की अभिव्यक्ति कभी नहीं हुई यह मूक प्रेम था। उसका विवाह हो गया। मुझसे नहीं, दूसरे से। मैं निर्धन था। उसके माता-पिता ने मुझसे विवाह करने की कभी सोची भी नहीं होगी; परन्तु मेरी धर्मपत्नी होकर जितना आन्तरिक सुख उसे होता, वह हम दोनों के सिवा कौन जान सकता था। उसका पति सुन्दर था। मैं समझता था कि वह सुखी होगी। मैं भी उसके सुख में अपने को सुखी समझता था; परन्तु मैं भ्रम में था, वह सुखी नहीं थी - उसके दिन बहुत दुख से कट रहे थे। उसे मानसिक दुख था, शारीरिक नहीं। मेरा विवाह अभी नहीं हुआ था। एक दिन उससे भेंट हुई। उसने कहा - तुम अपना विवाह कर लो। मैं कुछ कह न सका। फिर एक-दो वर्ष व्यतीत हो गये। एक दिन मैं उससे मिलने गया। उसके प्रति अब मेरे भाव निर्मल तथा पवित्र थे। मैंने कभी बुरी भावना से उसकी ओर नहीं देखा। उस दिन उससे बातचीत कर उसकी फुलवाड़ी में चला गया। खाने के लिए कुछ फल खोजने लगा; परन्तु कहीं कुछ नजर न आया।

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  5. डाकमुंशी

    कठिन पथ पर चले हुए श्रमित यात्रियों के समान एक इमली की सघन छाया में, जहाँ दो सड़कें मिली थीं, वहाँ वह कब से बैठता था, यह बतलाना कठिन है। कहानियों की भाषा में उसे अनन्त काल कहा जा सकता है; पर उसके चारों ओर एक ऐसा प्रचुर विश्राम था कि उसे देखकर ही सारी कल्पना जड़ हो जाती थी। जैसे - वह तरल कल्पना के अन्तिम बिन्दु पर पहुँचकर उसका एक दृढ़ और कटु उपहास कर रहा हो।झुकी हुई कमर, नागफनी का डंडा, मैली अचकन, डोरों से बँधी हुई ऐनक, बगल में बस्ता दबाए हुए वह आता और अपने मैले लाल-काले धब्बों के बिस्तर पर कुछ मनीऑर्डर फॉर्म, कुछ सादे लिफाफे कुछ पुराने खत और तस्वीरों वाले अखबार लेकर बैठ जाता।

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