अक्टूबर के आरंभ की बरसती साँझ - बसंत त्रिपाठी

बसंत त्रिपाठीबसंत त्रिपाठी25 Sept 1972

4 min read · 12.4K reads

यह अक्टूबर के आरंभ की
बरसती साँझ है

स्थगित मेघों ने डाल दिया है
आसमान में डेरा
पहले गरजे भयंकर
चिंग्घाड़ उठे हों
हाथियों के झुंड जैसे क्षितिज में
लंबे सफेद दाँतों-सी कड़कदार बिजली
काली विशाल देह
धूमिल अँधेरे का विस्तार

ऋतु-चक्र में परिवर्तन की इस बेला में
सावन के आवारा मेघ
भटकते हुए आए हैं
पृथ्वी का पता पूछते

बरसो हे मेघ
जल्दी बरसकर खाली करो
शरद के लिए आसमानी सिंहासन
कि शरद अब आता होगा
आती होगी उसकी ओस टपकाती देह
भरी-भरी हरी पृथ्वी
अब ठंडी चाँदनी से नहाएगी

धान को अभी पकना है
सुनहरा होना है
किसानों के बैरी न बनो मेघ

बरसो, बरसकर खाली करो गगन
हे अक्टूबर के अनाहूत मेघ!
बसंत त्रिपाठी
About the poet

बसंत त्रिपाठी

View profile & all 56 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like

कुछ नहीं चाहने वाली लड़कीसोलह की यह लड़की दो-तीन साल पहले तकपेड़-पौधों पर रखती थी पाँव— ऐश्वर्य राजभूमिहीनभूख के शिकार पर निकले ये शिकारीएकदम मुकम्मल आदमी हैं— हुकुम ठाकुरआओ मिट्टी-मिट्टी खेलेंहमें आँतों से सोचना होता हैसुबह और शाम की पालियों में कटता दिन— हुकुम ठाकुरसपनों की लाशेंशायद हम एक ऐसी दुनिया से विदा लेंगे जहाँ,क़ातिल ख़ुद से ही बरी कर लेता है ख़ुद को।— फ़रीद ख़ाँमेरा यह शब्दसमूह(तरुण कवियों के हाथ में)स्वप्न-वाटिका छूकर आते हुए मेरे इन शब्दों में जीवन-धारा की सुषमा— हीरेन भट्टाचार्यपृथ्वी मेरी कवितामेरी क़लम लोहार के हाथ का हथौड़ा, ठोंक-पीट कर बनाता हूँ शब्दकिसान के फाल जैसा पैना; हलरेखा में सोने की सीता,— हीरेन भट्टाचार्य