सनकी पुरातत्त्वविद् की भाँति
उठाता है कुदाल
खोद डालता है छाती
प्रकट होते हैं
स्मृतियों के खंडहर
सपनों के लय पर थिरकती
नर्तकी की टूटी मूर्ति
फ़रेब के टकसाल में ढले
वादों के सिक्के खोटे
रात, चाँद, बादल, ढीठ ख़याल...
नीचे—बहुत नीचे
दबा क्रूर हँसी और निर्मम उपेक्षाओं से
एक बच्चा लिए गाल पर चाटे का निशान
इतना अकेला कि करता टिड्डों-चींटों से दोस्ती
इतना नादान कि जननांग पर उगते बालों से परेशान
वह जानता है
पहचानता है उसे
मगर घर नहीं लाता
नहीं ही लाता
घर भोले लोगों के लिए
नहीं वाज़िब स्थान








