कटे पंखों वाली एक चिड़िया का उड़ जाना

आसित आदित्यआसित आदित्य

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कई दिनों से

हम बार-बार खोलते रहे थे

पिंजड़े का दरवाज़ा―

नहीं बाहर आई वो।

एक रात

अंकित है मेरी आत्मा के शिलालेख पर।

उस रात

देखा था मैंने―

औंधी पड़ी थी पानी की कटोरी,

बिखरे पड़े के अनाज के दाने...

अरे! दरवाज़ा भी तो बंद ही था

परंतु वो उड़ चुकी थी।

एक चिड़िया

कटे पंखों वाली...

आसित आदित्य
About the poet

आसित आदित्य

नई पीढ़ी के कवि-लेखक और अनुवादक।

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