कई दिनों से
हम बार-बार खोलते रहे थे
पिंजड़े का दरवाज़ा―
नहीं बाहर आई वो।
एक रात
अंकित है मेरी आत्मा के शिलालेख पर।
उस रात
देखा था मैंने―
औंधी पड़ी थी पानी की कटोरी,
बिखरे पड़े के अनाज के दाने...
अरे! दरवाज़ा भी तो बंद ही था
परंतु वो उड़ चुकी थी।
एक चिड़िया
कटे पंखों वाली...








