समय की पगडंडी पर
भागी जा रही है ज़िंदगी की खटारा दुपहिया
अचानक
हेडलाइट के दम तोड़ते पीले आलोक में
दिख जाती है एक बिल्ली मेरा रास्ता काटते हुए
जहाँ से बिल्ली ने काटा है रास्ता
वो मेरे सुख-दुःख के बीच की विभाजक रेखा है
तुम उस पार हो
सुख की परिधि में दुःखी
मेरे बग़ैर
मैं इस पार हूँ
दुःख की परिधि में दुःखी
अपनी कविताओं की लाशें फूँकता
मेरे प्यार,
अंधविश्वास में है विश्वास मुझे
अभी कुछ देर मुझे इस पार ही ठहरना होगा
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* कविता का शीर्षक शमीम कारहानी के एक ग़ज़ल की पहली पंक्ति है।








