नदी तीरे भादो की एक रात

आसित आदित्यआसित आदित्य

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करती है आग्रह

डपट भी देती है कभी-कभी—

उतरो तो पहले

तैरना-डूबना बाद में।

कविता नदी है

नदी प्रेम

और प्रेम...

एक बरसाती रात

तट से बँधी नाव खोल देना

भूलने का करना प्रयत्न—अंतिम!

तज देना संदेश की आशा

लौटना घर की तरफ़

(जो है नहीं, कहीं नहीं!)

और चुपके से रो देना।

आसित आदित्य
About the poet

आसित आदित्य

नई पीढ़ी के कवि-लेखक और अनुवादक।

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