पानी

अरुण देवअरुण देव16 Sept 1972

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हिल रहा था पानी का आँचल

कीचड़ से सनी उसकी देह जैसे सभ्यता का शव हो

कभी गाए थे कलश ने उसकी गरिमा के गीत

अंजुरी में मंत्र की तरह भरती थी उसकी पवित्रता

सभ्यताओं ने सुनी

घने जंगलों और उदास पहाड़ों से होकर

समतल मैदानों में बहता उसका गीत

धरती देखती थी प्यासी आँखों से

चमकते, गरजते, बरसते पानी की धज को

भीगी रात में वनस्पतियों के तन पर

ओस की टप-टप का संगीत भरता था जीवन

नदी किनारें जन्मी सभ्यताएँ

मछली की तरह रेत पर छटपटा रही हैं पत्थर की शय्या पर

अरुण देव
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अरुण देव

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    शिक्षा : जवाहरलाल नेहरू विश्व-विद्यालय(नई दिल्ली) से एम.फिल.,पी.एच.डी. ,विश्व-विद्यालय अनुदान आयोग की फेलोशिप के अंतर्गत मोहन राकेश और आचार्य महावीरप्रसाद द्दिवेदी पर शोध कार्य, क्या तो समय (कविता-संग्रह) 2004 भारतीय ज्ञानपीठ,नई दिल्ली, कुछ आलोचनात्मक लेख, संस्कृति,उपनिवेश और हिंदी आलोचना बहुवचन-८, राष्ट्र की अवधारणा, भारत का अतीत और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र,बहुवचन-11,उपनिवेश और हिंदी का स्वरूप,बहुवचन -२५ ,Mahatma Gandi international Hindi University,Verdha....... हिंदी नवरत्न.

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