दाँत का टूटना - अरुण देव

अरुण देवअरुण देव16 Sept 1972

3 min read · 12.4K reads

जहाँ से टूटा था दाँत
जीभ बार बार वहीं जाती सहलाती
बछड़े को जैसे माँ चाटती है
 
वह जगह ख़ाली रही
होंठ बन्द रहते
नहीं तो उजाड़ सा लगता वहाँ कुछ
 
गर्म ज़्यादा गर्म यही हाल ठण्डे का भी रहा
स्वाद जीभ पर बेस्वाद फिरता
कौर कौन गूँथे ?
 
जहाँ से टूटा था दाँत वहाँ एहसास के धागे अभी बचे थे
मशीन से उन्हें कुचलकर तोड़ दिया गया
 
दाँत लग तो गए हैं पर
जीभ अभी भी वहीं जाती है
क्या पता स्पर्श से यह जी उठे
 
दाँतों के बीच उन्हीं जैसा एक दाँत है, पर सुन्न
जैसे कोई कोई होते हैं आदमियों के बीच ।
अरुण देव
About the poet

अरुण देव

View profile & all 90 Poems / Stories

More from अरुण देव

  1. क्या तो समय - अरुण देव

    शिक्षा : जवाहरलाल नेहरू विश्व-विद्यालय(नई दिल्ली) से एम.फिल.,पी.एच.डी. ,विश्व-विद्यालय अनुदान आयोग की फेलोशिप के अंतर्गत मोहन राकेश और आचार्य महावीरप्रसाद द्दिवेदी पर शोध कार्य, क्या तो समय (कविता-संग्रह) 2004 भारतीय ज्ञानपीठ,नई दिल्ली, कुछ आलोचनात्मक लेख, संस्कृति,उपनिवेश और हिंदी आलोचना बहुवचन-८, राष्ट्र की अवधारणा, भारत का अतीत और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र,बहुवचन-11,उपनिवेश और हिंदी का स्वरूप,बहुवचन -२५ ,Mahatma Gandi international Hindi University,Verdha....... हिंदी नवरत्न.

    12.4K reads
  2. बाएँ बाजू का टूटना - अरुण देव

    दाएँ हाथ में बायाँ अदृश्य रहता थादायाँ ही जैसे हाथ हो

    12.4K reads
  3. आओ, आत्महत्या करें - अरुण देव

    १)इतिहास में उन्होंने कभी मुझे मारा था

    12.4K reads
  4. ततैया का घर - अरुण देव

    घरों में कहीं किसी जगह वह अपना घर बनाती हैंछत्ते जहाँ उनके अण्डे पलते हैं

    12.4K reads
  5. दर्दनाशक की मदद - अरुण देव

    यार, ये अच्छी बात है कि तुम्हें पता रहता है कि देह में दर्द कहाँ हैघुलकर हर लेते हो

    12.4K reads

More Poetry & Stories You May Like