एक व्यक्ति जिसके चले जाने से कोई ख़ाली जगह नहीं बनेगी
दरवाज़ा खोलकर चला जाएगा अपना निर्वासन और अपनी उपेक्षा साथ लेकर
और जैसा कि होता आया है लगातार उपस्थित लेकिन निरंतर उपेक्षित व्यक्तियों के साथ
उसके भी चले जाने पर लोग उमड़ पड़ेंगे अपनी शर्म और नज़दीकी दिखाने की युयुत्सा में
और ऐसा भी होता ही आया होगा कि
उस व्यक्ति के साथ लगातार बने रहे लोग
उसके जाने के बाद आए लोगों में
शामिल होने के लिए नहीं आएँगे
इस तरह
इन दो तरह के लोगों के द्वंद्व से या फिर
उपस्थित लोगों के स्वयं ही के विरोधाभासों से
स्मृति और संबंधों और सामाजिकता की एक परीक्षा संपन्न होगी
एक व्यक्ति के चले जाने की घटना के बाद के अनुष्ठान में
कहने की आवश्यकता नहीं पर मुँह खोलकर कह दिया जाए—
इस पूरे अनुष्ठान में
इस पूरी शर्म में
स्त्रियाँ कहीं नहीं हैं








