भोर का गीत

अजीत रायज़ादाअजीत रायज़ादा17 Aug 1947

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भोले आकाश का चंचल बतास ने

दिया क्या गुपचुप संदेस

दिशाओं के गाल हो गए लाल

खुले घटाओं के केश!

मुँह धोने नदी में चल दी

किरनियाँ गोरी-गोरी

करने लगी लहरों से छेड़छाड़

सूरज की बाँकी छोरी!

पानी भरने कुएँ पर आईं

गाँव की पनिहारिनें

गौरा की मानता मनाने को

चल दीं सारी सुहागिनें!

गायों को ले के चल दिया

नन्हा नटखट कान्हा

पेड़ों की छाँह में छेड़ा

मस्ती में उसने आल्हा!

फूलों के नयनों से ढुलकी

आँसू जैसी ओस रे

बन में है झूमती वल्लरी

गंध के आस-पड़ोस रे!

बहेलिए के जाल में फँस गया

नवजात मृग का छौना

साँस थामे देखता रह गया

बन का कोना-कोना!

गूँजती है अमराइयों में

कोयलिया की कूकें

बिरहन की छाती में उठतीं

आज बला की हूकें!

धूप से नहा गए देखो

खेत और खलिहान सारे

बैल ले के चल पड़ा गाता

किसान बड़े भिनसारे!

अजीत रायज़ादा
About the poet

अजीत रायज़ादा

सुपरिचित कवि-लेखक और प्रशासनिक अधिकारी। एक से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। 'हाशिए पर आदमी' उल्लेखनीय कविता-संग्रह। मूल नाम : अजीत रायज़ादा जन्म : 17/08/1947 | सीतापुर, उत्तर प्रदेश अजीत रायज़ादा का जन्म 17 सितंबर 1947 को उत्तर प्रदेश के सीतापुर में हुआ। उन्होंने स…

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