सन् 1992

अदनान कफ़ील दरवेशअदनान कफ़ील दरवेश30 Sept 1994

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जब मैं पैदा हुआ

अयोध्या में ढहाई जा चुकी थी एक क़दीम मुग़लिया मस्जिद

जिसका नाम बाबरी मस्जिद था

ये एक महान सदी के अंत की सबसे भयानक घटना थी

कहते हैं पहले मस्जिद का एक गुंबद

धम्म् की आवाज़ के साथ ज़मीन पर गिरा था

और फिर दूसरा और फिर तीसरा

और फिर गिरने का जैसे अनवरत क्रम ही शुरू हो गया

पहले कीचड़ में सूरज गिरा

और मस्जिद की नींव से उठता ग़ुबार

और काले धुएँ में लिपटा अंधकार

पूरे मुल्क पर छाता चला गया

फिर नाली में हाजी हश्मतुल्लाह की टोपी गिरी

सकीना के गर्भ से अजन्मा बच्चा गिरा

हाथ से धागे गिरे, रामनामी गमछे गिरे, खड़ाऊँ गिरे

बच्चों की पतंगें और खिलौने गिरे

बच्चों के मुलायम स्वप्नों से परियाँ चीख़ती हुई निकलकर भागीं

और दंतकथाओं और लोककथाओं के नायक चुपचाप निर्वासित हुए

एक के बाद एक

फिर गाँव के मचान गिरे

शहरों के आसमान गिरे

बम और बारूद गिरे

भाले और तलवारें गिरीं

गाँव का बूढ़ा बरगद गिरा

एक चिड़िया का कच्चा घोंसला गिरा

गाढ़ा गरम ख़ून गिरा

गंगा-जमुनी तहज़ीब गिरी

नेता-परेता गिरे, सियासत गिरी

और इस तरह एक के बाद एक नामालूम कितना कुछ

भरभरा कर गिरता ही चला गया

“जो गिरा था वो शायद एक इमारत से काफ़ी बड़ा था...”

कहते-कहते अब्बा की आवाज़ भर्राती है

और गला रुँधने लगता है

इस बार पासबाँ नहीं मिले काबे को सनमख़ाने से

और एक सदियों से मुसलसल खड़ी मस्जिद

देखते-देखते मलबे का ढेर बनती चली गई

जिन्हें नाज़ है हिंद पर

हाँ, उसी हिंद पर

जिसकी सरज़मीं से मीर-ए-अरब को ठंडी हवाएँ आती थीं

वे कहाँ हैं?

मैं उनसे पूछना चाहता हूँ

कि और कितने सालों तक गिरती रहेगी

ये नामुराद मस्जिद

जिसका नाम बाबरी मस्जिद है

और जो मेरे गाँव में नहीं

बल्कि दूर अयोध्या में है

मेरे मुल्क के रहबरों और ज़िंदा बाशिंदों बतलाओ मुझे

कि वो क्या चीज़ है जो इस मुल्क के हर मुसलमान के भीतर

एक ख़फ़ीफ़ आवाज़ में न जाने कितने बरसों से

मुसलसल गिर रही है

जिसके ध्वंस की आवाज़ अब सिर्फ़ स्वप्न में ही सुनाई देती है!

अदनान कफ़ील दरवेश
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अदनान कफ़ील दरवेश

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