प्रेमिका

उपासना झाउपासना झा

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चिट्ठी की वह पँक्ति है प्रेमिका

जो अनावश्यक मान हटाई जा सकती है

दराज़ में रखी ग़ैर-ज़रूरी चीज़ों की तरह

कभी भी

तुम्हारे जीवन-संगीत में

कोमल स्वर है वह

जिसकी जगह बदलकर कर सकते हो

शुद्ध से विकृत

वह स्वरभंग है प्रेमिका

जिसकी नहीं होती आवृत्ति

'प्रिया' से 'तुम जैसी स्त्री' हो जाना

घटनाओं में सामान्य है

प्रेमिका नहीं होती तुम्हारे त्यौहारों में, उत्सवों में

तुम्हारी वसीयतों में

प्रेमिका वह रहस्य है

जिसका अस्तित्व गोपन है

प्रेमिका वह अभिलाषा है

जो रह गई अमूर्त

प्रेमिका वह स्त्री है जिसने

तुम्हें सब दिया

जिसे तुम नहीं दे सके

अलगाव का भी गौरव...

उपासना झा
About the poet

उपासना झा

नई पीढ़ी की सुपरिचित कवयित्री।

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