तुम्हारी छाती और कंधों पर
देखती हूँ पिघला हुआ सुवर्ण
होंठों के कोनों से बहकर
गले पर ढुलक आई
पानी की एक बूँद देखकर
लग आई है मुझे प्यास
उलझे हुए मेरे केशों में
तुम्हारे स्वेद का पराग है
तुमने हाथ बढ़ाकर छू
लिया है मेरा माथा
रूस उठे हैं मेरे गाल
अभिमान से भर उठी हैं बाँहें
देखती हूँ पृष्ठ पर उग आए
कई प्रेमिल चिह्न
तुम्हारी ग्रीवा और वक्ष
है मेरे सिंदूर से अरुणाभ
एक सलज्ज मुस्कान
ढाँप लेती है मेरा मुख
अर्धनिद्रित तुम्हारी आँखों से
झाँकती है एक नई इच्छा
तुमने तकिए को लगाया है वक्ष से
डाह से जल उठती है मेरी देह
अभी सह्य नहीं मुझे
एक करवट भर की दूरी भी








