आकाश जब मनुष्य में झाँकता है
धरती की दरारें त्वचाओं पर
दीमक की तरह चढ़ आती हैं
ख़ालीपन शहर भर में घूमता है
जिसके पास एक बंदूक़ है
ज़मीन पर लटकती
कुरेदती
मेरी जगहों पर आ जाता है कोई
ख़ाली नहीं बचती वे जगहें
जो मेरी थीं
एक सरल अँधेरा है
गहनता की छिछली परछाईं के साथ
और एक दुनिया
जिसे रोशनी ने प्रदूषित कर रखा है।








