ख़ालीपन

उज्ज्वल शुक्लउज्ज्वल शुक्ल

1 min read · 12.4K reads

आकाश जब मनुष्य में झाँकता है

धरती की दरारें त्वचाओं पर

दीमक की तरह चढ़ आती हैं

ख़ालीपन शहर भर में घूमता है

जिसके पास एक बंदूक़ है

ज़मीन पर लटकती

कुरेदती

मेरी जगहों पर आ जाता है कोई

ख़ाली नहीं बचती वे जगहें

जो मेरी थीं

एक सरल अँधेरा है

गहनता की छिछली परछाईं के साथ

और एक दुनिया

जिसे रोशनी ने प्रदूषित कर रखा है।

उज्ज्वल शुक्ल
About the poet

उज्ज्वल शुक्ल

नई पीढ़ी के कवि। मूल नाम : उज्ज्वल शुक्ल जन्म : इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश

View profile & all 5 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like