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उज्ज्वल शुक्लउज्ज्वल शुक्ल

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बिल्लियों के पर नहीं होते

और कौए जूते नहीं चाटते

भूख पर कविता

उतनी अधूरी रह जाती है

जितना भूख में कवि होना

एक आदमी झूठे आरोप में

बाईस बरस जेल रहा

वह भगवान के गुण गाता था जेल में

वह जेल जो मैंने कभी देखी नहीं

वह वहाँ पुजारी था

वह बाहर क्या होगा?

कहते हैं—नटों के घर नहीं होते

कहते हैं—कविताएँ संवाद करती हैं

घर आपस में कोई बात नहीं करते

वे कौन लोग हैं

जो घर बने रहते हैं

संवाद करते हैं।

उज्ज्वल शुक्ल
About the poet

उज्ज्वल शुक्ल

नई पीढ़ी के कवि। मूल नाम : उज्ज्वल शुक्ल जन्म : इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश

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