सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम के शेर

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िमसय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम5 Mar 1816 – 21 Apr 1865

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ये किस ज़ोहरा-जबीं की अंजुमन में आमद आमद है

बिछाया है क़मर ने चाँदनी का फ़र्श महफ़िल में


है ईद मय-कदे को चलो देखता है कौन

शहद ओ शकर पे टूट पड़े रोज़ा-दार आज


वही माबूद है 'नाज़िम' जो है महबूब अपना

काम कुछ हम को न मस्जिद से न बुत-ख़ाने से


ईद के दिन जाइए क्यूँ ईद-गाह

जब कि दर-ए-मय-कदा वा हो गया


सँभाल वाइ'ज़ ज़बान अपनी ख़ुदा से डरा इक ज़रा हया कर

बुतों की ग़ीबत ख़ुदा के घर में ख़ुदा ख़ुदा कर ख़ुदा ख़ुदा कर


बोसा-ए-आरिज़ मुझे देते हुए डरता है क्यूँ

लूँगा क्या नोक-ए-ज़बाँ से तेरे रुख़ का तिल उठा


वाइ'ज़ ओ शैख़ सभी ख़ूब हैं क्या बतलाऊँ

मैं ने मयख़ाने से किस किस को निकलते देखा


कहते हो सब कि तुझ से ख़फ़ा हो गया है यार

ये भी कोई बताओ कि किस बात पर हुआ


अफ़्साना-ए-मजनूँ से नहीं कम मिरा क़िस्सा

इस बात को जाने दो कि मशहूर नहीं है


जुम्बिश अबरू को है लेकिन नहीं आशिक़ पे निगाह

तुम कमाँ क्यूँ लिए फिरते हो अगर तीर नहीं


रोज़ा रखता हूँ सुबूही पी के हंगाम-ए-सहर

शाम को मस्जिद में होता हूँ जमाअत का शरीक


आ गया ध्यान में मज़मूँ तिरी यकताई का

आज मतला हुआ मिस्रा मिरी तन्हाई का


पुर्सिश को अगर होंट तुम्हारे नहीं हिलते

क्या क़त्ल को भी हाथ तुम्हारा नहीं उठता


ईद है हम ने भी जाना कि न होती गर ईद

मय-फ़रोश आज दर-ए-मय-कदा क्यूँ वा करता


जब तिरा नाम सुना तो नज़र आया गोया

किस से कहिए कि तुझे कान से हम देखते हैं


भला क्या ता'ना दूँ ज़ुहहाद को ज़ुहद-ए-रियाई का

पढ़ी है मैं ने मस्जिद में नमाज़-ए-बे-वज़ू बरसों


शबिस्ताँ में रहो बाग़ों में खेलो मुझ से क्यूँ पूछो

कि रातें किस तरह कटती हैं दिन कैसे गुज़रते हैं


शाएर बने नदीम बने क़िस्सा-ख़्वाँ बने

पाई न उन के दिल में मगर जा किसी तरह


बे दिए ले उड़ा कबूतर ख़त

यूँ पहुँचता है ऊपर ऊपर ख़त


कहते हैं छुप के रात को पीता है रोज़ मय

वाइ'ज़ से राह कीजिए पैदा किसी तरह


क्या खाएँ हम वफ़ा में अब ईमान की क़सम

जब तार-ए-सुब्हा रिश्ता-ए-ज़ुन्नार हो चुका


कम समझते नहीं हम ख़ुल्द से मयख़ाने को

दीदा-ए-हूर कहा चाहिए पैमाने को


साहिल पर आ के लगती है टक्कर सफ़ीने को

हिज्राँ से वस्ल में है सिवा दिल की एहतियात


ख़रीदारी है शहद ओ शीर ओ क़स्र ओ हूर ओ ग़िल्माँ की

ग़म-ए-दीं भी अगर समझो तो इक धंदा है दुनिया का


चले हो दश्त को 'नाज़िम' अगर मिले मजनूँ

ज़रा हमारी तरफ़ से भी प्यार कर लेना


जाती नहीं है सई रह-ए-आशिक़ी में पेश

जो थक के रह गया वही साबित-क़दम हुआ


चाहूँ कि हाल-ए-वहशत-ए-दिल कुछ रक़म करूँ

भागें हुरूफ़ वक़्त-ए-निगारिश क़लम से दूर


क्या मेरे काम से है रवाई को दुश्मनी

कश्ती मिरी खुली थी कि दरिया ठहर गया


मुहताज नहीं क़ाफ़िला आवाज़-ए-दरा का

सीधी है रह-ए-बुत-कदा एहसान ख़ुदा का


उस बुत का कूचा मस्जिद-ए-जामे नहीं है शैख़

उठिए और अपना याँ से मुसल्ला उठाइए


घर की वीरानी को क्या रोऊँ कि ये पहले सी

तंग इतना है कि गुंजाइश-ए-ता'मीर नहीं


न बज़ला-संज न शाएर न शोख़-तब्अ रक़ीब

दिया है आप ने ख़ल्वत में अपनी बार किसे


है रिश्ता एक फिर ये कशाकश न चाहिए

अच्छा नहीं है सुब्हा का ज़ुन्नार से बिगाड़


बरसों ढूँडा किए हम दैर-ओ-हरम में लेकिन

कहीं पाया न पता उस बुत-ए-हरजाई का


एक है जब मरजा-ए-इस्लाम-ओ-कुफ़्र

फ़र्क़ कैसा सुब्हा-ओ-ज़ुन्नार का


रोने ने मिरे सैकड़ों घर ढा दिये लेकिन

क्या राह तिरे कूचे की हमवार निकाली


है दौर-ए-फ़लक ज़ोफ़ में पेश-ए-नज़र अपने

किस वक़्त हम उठते हैं कि चक्कर नहीं आता


है जल्वा-फ़रोशी की दुकाँ जो ये अब इसी ने

दीवार में खिड़की सर-ए-बाज़ार निकाली


हक़ ये है कि का'बे की बिना भी न पड़ी थी

हैं जब से दर-ए-बुत-कदा पर ख़ाक-नशीं हम


जब गुज़रती है शब-ए-हिज्र मैं जी उठता हूँ

ओहदा ख़ुर्शीद ने पाया है मसीहाई का


'नाज़िम' ये इंतिज़ाम रिआ'यत है नाम की

मैं मुब्तला नहीं हवस-ए-मुल्क-ओ-माल का


बंद महरम के वो खुलवातें हैं हम से बेशतर

आज-कल सोने की चिड़िया है हमारे हाथ में


फूँक दो याँ गर ख़स-ओ-ख़ाशाक हैं

दूर क्यूँ फेंको हमें गुलज़ार से


कुफ़्र-ओ-ईमाँ से है क्या बहस इक तमन्ना चाहिए

हाथ में तस्बीह हो या दोश पर ज़ुन्नार हो

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
About the poet

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

उपनाम : 'नाज़िम' मूल नाम : नवाब यूसुफ़ अ’ली ख़ाँ जन्म : 05 Mar 1816 | रामपुर, उत्तर प्रदेश निधन : 21 Apr 1865 | रामपुर, उत्तर प्रदेश संबंधी : मोमिन ख़ाँ मोमिन (गुरु) नाज़िम, नवाब यूसुफ़ अ’ली ख़ाँ(1816-1865)रियासत रामपुर के नवाब थे। पहले ‘मोमिन’ और फिर ‘ग़ालिब’ के शाग…

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