रोने की ये शिद्दत है कि घबरा गईं आँखें

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िमसय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम5 Mar 1816 – 21 Apr 1865

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रोने की ये शिद्दत है कि घबरा गईं आँखें

अश्कों की ये कसरत है कि तंग आ गईं आँखें

दिल सख़्त ही काफ़िर का पर आँखों में हया है

सुनते ही जफ़ा का गिला शरमा गईं आँखें

मेहराब में होता नहीं मस्तों का गुज़ारा

अबरू के तले ख़ूब जगह पा गईं आँखें

वो तालिब-ए-दीदार के पास आएँ मगर क्या

हैरत का ये आलम है कि कूबा गईं आँखें

फ़रहाद ने क्या देख के सर तेशे से फोड़ा

सूझा न कुछ इस रू से कि तिहरा गईं आँखें

दिल दे के रहा गिर्या-ए-ख़ूनी का मुझे शग़्ल

बाक़ी था जिगर सो उसे यूँ कहा गईं आँखें

चढ़ते नहीं अब मेरी नज़र में मह-ओ-ख़ुर्शीद

देखा तुझे क्या मैं ने कि इतरा गईं आँखें

आ कर तिरे कूचे में न कुछ हम से बन आई

जाते हुए इक मुँह था कि बरसा गईं आँखें

इतना भी न समझे कि बला-ए-दिल-ओ-दीं है

'नाज़िम' तुम्हें क्यूँ उस की पसंद आ गईं आँखें

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
About the poet

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

उपनाम : 'नाज़िम' मूल नाम : नवाब यूसुफ़ अ’ली ख़ाँ जन्म : 05 Mar 1816 | रामपुर, उत्तर प्रदेश निधन : 21 Apr 1865 | रामपुर, उत्तर प्रदेश संबंधी : मोमिन ख़ाँ मोमिन (गुरु) नाज़िम, नवाब यूसुफ़ अ’ली ख़ाँ(1816-1865)रियासत रामपुर के नवाब थे। पहले ‘मोमिन’ और फिर ‘ग़ालिब’ के शाग…

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